संस्कृति – देश की पहचान | रौशन कुमार

रौशन जी की यह कविता भारत की युवा पीढ़ी की वास्तविकता पर चोट करती है, हो सकता है किसी मित्र को बुरा लगे तो मै क्षमा चाहूंगा , लेकिन जो सच है , उसे बयां करना भी जरूरी था।

शीर्षक -“संस्कृति – देश की पहचान”

जवां दिल और जवां मौसम संग

लूट गई आज जवानी भी

शर्मो- हया की बातें करना

अब लगता है बेमानी भी

पश्चिम के प्रभाव से भैया

कपड़े हो गए छोटे जी

थोड़ी सी हया भी बच जाती

गर जो घुंघट होते भी

सभ्य समाज की संकल्पना

कैसे बूढ़ा बाप करे

भरी सभा में गर बेटी ही

खुल्लम- खुल्ला नाच करे

ताका- झांकी में लगे रह कर

बिगड़े बाप के बेटे भी

बिक गई पुरखों के धरोहर

जेवर , मकान और खेतें भी

हरी – भरी दुनिया में लाकर

जिसने तुम्हे संवारा है

देव स्वरूप पूजन के बदले

तुमने उन्हें दुत्कारा है

मत भूल तुम उस  भारत के बेटे हो

जिसने दुनिया को ज्ञान दिया

तुम लड़ते हो भाई- भाई में

उसने दुश्मन को सम्मान दिया

ये भटकी हुई राहों की यारों

छोटा सा परिणाम है

छोटा सा परिणाम है

जो हो रहा अविराम है

निंदा नहीं भगिनी- बन्धु की

पर , उनसे ये अरमान है

अपनाओ सभ्यता – संस्कृति अपनी

क्यूंकि, संस्कृति ही देश की पहचान है

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी

रौशन कुमार “प्रिय”

गांव – सोंधी,

पोस्ट – शरमा, जिला -लखीसराय, बिहार

पिता दिवस पर विशेष By Pratishtha Sharma

“पिता दिवस पर विशेष” कविता प्रस्तुत कर रही है “प्रतिष्ठा शर्मा” जी। पिता की भूमिका को क्या बखूबी वर्णित किया है।

पिता दिवस पर विशेष

जीवन की टेढ़ी – मेढ़ी पगडंडियों पर,

 जिसने चलना सिखाया है।

 काँटों पर खुद चलकर,

हर चुभन से मुझे बचाया है।

जिनके स्पर्श से सदैव,

एक सुकूं-सा दिल को होता है।

वो तब – तब मेरे समीप होते हैं,

जब – जब ये दिल रोता है।

जिनकी स्मृति अधरों पर,

अश्रुपूर्ण मुस्कान ला देती है।

एक ठंडी श्वास.. एक आस,

एक विश्वास जगा देती है।

हर रिश्ते से परे ये अह्सास करा देती है।

कि.. तू आज भी अपने पिता की ही बेटी है,

आज जो कुछ भी जीवन में पाया है,

वो सब उन्हीं का सिखाया है।

वो सशरीर भले ही साथ न हों,

लेकिन मुझपर..सदैव उनका साया है।

सब कुछ होते हुए भी हृदय में,

एक रिक्तता का अह्सास होता है।  

और कभी – कभी ‘ ये ‘ आभास होता है।

कि काश! काश,

अपने जीवन की माला में कुछ..

और मोती पिरोती कुछ…

और बचपन होता कुछ

और.. खुशियाँ होतीं

 ग़र आज ‘ वो ‘ साथ होते

तो.. कुछ और बात होती ।