हिन्दु

"अचल ठाकुर" द्वारा रचित कविता "हिन्दू", वे सोमनाथ प्रहारों को जिन्हे, आज भी भारत भूला ना । उन दिल्ली नरसंहारों पर, जब खून तुम्हारा खौला ना ।

हिन्दु

विशाल हृदय से हाथ खोल, तुमने सबको स्वीकारा है ।
विश्व ने उसी बड़े दिल को , कायरता कह धिक्कारा है ।
क्या चौखट पर खड़े होकर, घर अपना लुटवाओगे ।
सहनशीलता वाली आखिर, छवि कब तक अपनाओगे ।
इतिहास सदा गढ़ता खुद पर, बस युद्ध जीत महावीरों को ।
इतिहास भला कब बोध कराता, हरम में हरते चीरों को ।

वे सोमनाथ प्रहारों को जिन्हे, आज भी भारत भूला ना । उन दिल्ली नरसंहारों पर, जब खून तुम्हारा खौला ना ।

अब भारत भूमि हिन्दु न, जो बुद्ध ज्ञान बतलाओगे
किसी अंगुलीमाल के हाथों, निश्चित मारे जाओगे ।
जहां मिथ्य कहें निर्भय होकर, वहां सत्य क्यों तोला जाए ।
गर युद्ध अंतिम राह बचे, फिर युद्धाघोस बोला जाए ।
वे सोमनाथ प्रहारों को जिन्हे, आज भी भारत भूला ना ।
उन दिल्ली नरसंहारों पर, जब खून तुम्हारा खौला ना ।
हो कैसे सतत प्रयासी तुम, जिनके प्रयास न पूर हुए ।
बस एक बाबरी गिरा सके, जब लाखों मंदिर चूर हुए ।
हर बार कोई साथ चलेगा, ऐसा सोच क्यों चलते हो ।
हर बार कोई पीछे होगा, ऐसा सोच क्यों पलटे हो ।
हर घड़ी रेत  निकल रही, स्थिति तुम्हारे हाथों से ।
संस्कृति सनातन संकट में, इन बटती जाति पातों से ।
मैं खड़ा जो सबसे कहता हूं, वह बात तुम्हारी सबकी है ।
हिंदुस्तान हिन्दू स्थान की, बारी अंतिम अबकी है ।

                              रचीयता – अचल ठाकुर🚩

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