आज, मैं एक ऐसी महिला के बारे में लिखने जा रहे है जिन्होंने गांधी की अहिंसा के बिल्कुल विपरीत रास्ता चुना। एक अनजान नायिका एक ऐसी महिला है जिसके बारे में बहुत कम भारतीय जानते हैं। एक ऐसी महिला जिसने भारत को आजाद करने के लिए खतरों का जीवन चुना। वो महिला थी, दुर्गा देवी वोहरा।  जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘दुर्गा भाभी’ कहा जाता था।

एक ऐसी महिला जिसने भारत को आजाद करने के लिए खतरों का जीवन चुना। वो महिला थी, दुर्गा देवी वोहरा।  जिन्हें लोकप्रिय रूप से ‘दुर्गा भाभी’ कहा जाता था।

दुर्गा देवी वोहरा

भगवती चरण वोहरा की पत्नी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की एक सक्रिय सदस्य, दुर्गा देवी वोहरा, सबसे प्रमुख महिला क्रांतिकारियों में से एक थीं। जिन्होंने वास्तव में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सशस्त्र क्रांति में भाग लिया था।

इनका जन्म 7 अक्तूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में एक संपन्न परिवार में हुआ था। अपने बचपन में अंग्रेजी शासन द्वारा भारत पर किए जा रहे क्रूर अत्याचारों ने उनके मन में अंग्रेजों के प्रति रोष भर दिया था।

 उनके पति भगवती चरण के बारे में बात करें तो वो 1920 के दशक में भारत में व्यापक सत्याग्रह आंदोलनों में शामिल हो गए थे। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में एक छात्र के रूप में, भगत सिंह, सुखदेव और यशपाल के साथ एक अध्ययन मंडल शुरू किया जो दुनिया भर में हो रही क्रांतिकारी गतिविधियों का अध्ययन करते थे।  

क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत

दुर्गा देवी जी पहली बार अपने पति, भगवती चरण वोहरा (1903-1930), एक अमीर गुजराती, शिव चरण दास के बेटे, के माध्यम से लाहौर में क्रांतिकारियों के संपर्क में आईं। वह नौजवान भारत सभा की एक सक्रिय सदस्य थीं। वे उस समय प्रमुखता में आईं, जब सभा ने नवंबर 1926 में लाहौर में करतार सिंह सराभा की शहादत की 11वीं वर्षगांठ मनाने का फैसला किया।

1928 के अंत तक, भगवती चरण वोहरा और दुर्गा देवी को पार्टी में शामिल कर लिया गया और वे HSRA के प्राथमिक विचारकों में से एक बन गए। भगवती चरण ने हाल ही में लाहौर में बम बनाने के लिए एक कमरा किराए पर लिया था।

दुर्गा देवी को भूमिगत होने के लिए मजबूर होना पढ़ा था। जब अंग्रेज अधिकारियों ने HSRA सदस्यों के खिलाफ क्रूर दमनकारी अभियान शुरू किया था।

जॉन सॉन्डर्स की हत्या

17 दिसंबर 1928 को, जब भगवती चरण कलकत्ता में थे, तब ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी गई थी। सरकार ने लाहौर में कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। अपने तीन साल के बेटे के साथ घर पर अकेली थी जब रात में किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खुला तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु वहां मौजूद थे। तीनों सॉन्डर्स को मार कर पहुंचे थे।उसने उन्हें तुरंत आश्रय दिया, लेकिन यह काफी नहीं था। उसने भगत सिंह की पत्नी बनने का नाटक किया और उन्हे ट्रेन से लाहौर से सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

यह कार्य निश्चित रूप से आज के भारत में भी दुस्साहसी है और उन दिनों ये कार्य करना बहुत बड़ा खतरा मोल लेना था। यह उनका दृढ़ संकल्प और अपार साहस था जिसने भगत सिंह को बचाया।

कम उम्र में विधवा

दुर्गा बंगाली थीं। वो मुश्किल से ग्यारह साल की थीं, तब उनकी शादी वोहरा से हुई थी। उनके पति भी एक क्रांतिकारी थे, जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर भगत सिंह को फांसी से पहले ही जेल पर बमबारी करके मुक्त करने की योजना बनाई थी। दुर्भाग्य से, लाहौर के पास रावी नदी के तट पर बम का परीक्षण करते समय, प्रो वोहरा की मृत्यु हो गई, और वह बहुत कम उम्र में विधवा हो गई।

वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्षितिज पर एक उल्का की तरह उठी, जिसने भगत सिंह, अशफाकउल्लाह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों पर जबरदस्त प्रभाव डाला। सबसे शुरुआती महिला स्वतंत्रता सेनानियों में से एक, दुर्गावती का हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के सदस्यों पर गहरा प्रभाव था, जिसमें ये सभी क्रांतिकारी शामिल थे।

क्रांतिकारियों को मिली मौत की सजा का बदला।

जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत की सजा दी गई, तो दुर्गा इसका विरोध करने के लिए खुलकर मैदान में आ गईं।भगत सिंह और अन्य की फांसी का बदला लेने के लिए, दुर्गा ने पंजाब के पूर्व गवर्नर लॉर्ड हैली को मारने का फैसला किया, जो क्रांतिकारियों के कट्टर दुश्मन भी थे। हालांकि राज्यपाल बच गए, लेकिन उनके सहयोगी घायल हो गए। दुर्गा को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तीन साल कैद की सजा सुनाई गई।

जब भारत आजाद हुआ।

स्वतंत्रता के बाद, दुर्गा एक अज्ञात जीवन जीने लगीं। देश उनकी बहादुरी और कुर्वनियाँ भूल चुका था। दुर्गा ने गाजियाबाद में गुमनामी में एक आम नागरिक के रूप में रहना शुरू किया। उन्होंने लखनऊ के पुराना किला इलाके में गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। 1956 में प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी उनके स्कूल का दौरा किया था। जिसे अब सिटी मोंटेसरी स्कूल के नाम से जाना जाता है। उन्होंने शहीद सोध संस्थान के लिए अपनी जमीन भी दान कर दी। 15 अक्टूबर 1999 को 92 वर्ष की आयु में उनका गाजियाबाद में निधन हो गया।

भारत की अग्नि

दुर्गावती देवी को अभी भी ब्रिटिश पुलिस के लिए एक आतंक के रूप में याद किया जाता है। उन्हें “भारत की अग्नि” कहा जाता है। युवा पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए इस महान स्वतंत्रता सेनानी और निडर महिला की गाथा हमें आगे ले जानी होगी। इनके जीवन पर भी कोई फिल्म बननी चाहिए। हालांकि उनके चरित्र का एक छोटा सा संदर्भ राकेश ओमप्रकाश मेहरा की रंग दे बसंती में देखा गया था। जिसमें सोहा अली खान ने उनकी भूमिका निभाई थी। लेकिन वो काफी नहीं है।

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