भारत माता के सपूत

रोहताश वर्मा 'मुसाफिर' द्वारा रचित कविता
यह रचना स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित है जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए स्वयं को न्यौछावर किया था।

देख जिन्हें भारत माता,
मंद मंद मुस्कायी थी।
वो वीर थे कितने साहसी?
मौत भी देख घबरायी थी।।

वेदी पर शीश चढ़ाया,
हर यातना वरण किया।
फिरंगी को धूल चटाकर,
आजादी के शरण किया।।

उन्हें नमन है भारत का,
जो शूल-शैया पर लेटे थे।
मैं गर्व से करता सलाम जिन्हें,
वो भारत मां के बेटे थे।।

छोटे से एक भगत ने आकर,
हथियार जमीं में बोया था।
इंकलाब की लौ जलाकर,
तमस कोठरी में सोया था।।

कभी नहीं झुका वो,
बदला कर वसूल गया।
हजारों मां की खुशियों खातिर,
हंसता हंसता ही झूल गया।।

ब्रिटिश सत्ता के मुंह पर,
क्रांति के मारे चपेटे थे।
छोटी सी उम्र में झूलने वाले,
वो भारत मां के बेटे थे।।

कोई जला मां की रक्षा में,
कोई भूख-प्यास से आबाद रहा।
थर्राते जिसकी ललकार से,
वो आजाद था, आजाद रहा।।

चला था चरखा देशी लिबास में,
अहिंसा संग जयघोष किया।
फिर मां ने युद्ध भूमि में,
आजाद हिंद का बोस दिया।।

जिसके चक्रव्यूह में फिरंगी,
वल्लरी से फंसे, लपेटे थे।
विदेशों में लौहा मनवाने वाले,
वो भारत मां के बेटे थे।।

मुसाफिर

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