Lion’s of Kargil विक्रम बत्रा

आर्मी से पहले की जिंदगी।

अपने सहपाठियों के बीच बेहद लोकप्रिय, कैप्टन बत्रा स्कूल में एक ऑल-राउंडर थे। यह उनके परिवार के लिए आश्चर्य की बात थी। जब उन्होंने संयुक्त रक्षा सेवा (सीडीएस) परीक्षा की तैयारी शुरू की।

उन्हें हांगकांग स्थित एक फर्म द्वारा मर्चेंट नेवी में नौकरी की पेशकश भी की गई थी। बत्रा ने उसकी पूरी तैयारी भी कर ली थी और अपनी वर्दी भी सिलवा ली थी। लेकिन उनका
मन बदल गया और उन्होंने भारतीय सेना की सेवा को चुना।

A Kargil hero
Ye dil mange more

विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास घुग्गर गाँव में जी0 एल0 बत्रा और जय कमल बत्रा के यहाँ हुआ था।

कारगिल में posting

कैप्टन बत्रा ने 1 जून 1999 को कारगिल में ड्यूटी शुरू की। ऑपरेशन के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा की 13 JAK राइफल्स की डेल्टा कंपनी में तैनाती की गई थी।

5140 पर कब्जा।

18 दिनों के बाद उन्हें युद्ध में अपनी पहली बड़ी लड़ाई में प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने का आदेश दिया गया। उनके साहस और बहादुरी के लिए उन्हें उपनाम शेर शाह (शेर राजा) दिया गया था।

बत्रा ने दुश्मन को आश्चर्यचकित करने के लिए पीछे से चट्टान पर चढ़ने का फैसला किया। वह और उनके लोग संकरी चट्टान पर चढ़ने लगे। जैसा कि वे चट्टान के ऊपर आ रहे थे, उन्हें दुश्मनों द्वारा भारी मशीन गन फायर द्वारा पिन किया गया था। खतरे के बावजूद कैप्टन बत्रा अपने 5 सैनिकों के साथ चट्टान पर चढ़ गए। ऊपर पहुँचने पर उसने मशीन गन की स्थिति में दो हथगोले फेंके।

Kargil hero
Ye dil mange more

कैप्टन विक्रम बत्रा ने हाथों-हाथ लड़ाई में 3 दुश्मन सैनिकों को मार गिराया। इस कार्रवाई के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए लेकिन उन्होंने अपने सैनिकों को आगे बढ़ने और मिशन जारी रखने पर जोर दिया।

कैप्टन बत्रा की बहादुरी और साहस ने उनके सैनिकों को दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने और कब्जा करने के लिए प्रेरित किया।

उनके जोश और साहस की बदौलत प्वाइंट 5140, 20 जून 1999 को 3:30 बजे तिरंगा लहरा दिया गया। उनकी कंपनी को 8 दुश्मन सैनिकों को मारने और एक भारी मशीन गन को जब्त करने का श्रेय दिया गया।

4700, 4875 फते।

प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने से प्वाइंट 4700, जंक्शन पीक, प्वाइंट 5100 जैसी जीत की श्रृंखला शुरू हुई। कैप्टन अनुज नैयर के साथ कैप्टन बत्रा ने प्वाइंट 4875 और प्वाइंट 4750 पर जीत के लिए अपने सैनिकों का नेतृत्व किया।

7 जुलाई 1999 की सुबह कप्तान विक्रम ने प्वाइंट 4875 के खिलाफ दुश्मनों द्वारा जवाबी हमले के दौरान एक घायल अधिकारी को बचाने की कोशिश करते हुए शहीद हो गए। उनके अंतिम शब्द थे, “जय माता दी।”

उनकी बहादुरी और साहस को देखते हुए भारत सरकार ने कैप्टन विक्रम बत्रा को भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

लेफ्टिनेंट से कैप्टन

लेफ्टिनेंट बत्रा और उनके साथियों ने प्वाइंट 5140 को एक भी जीवन के नुकसान के बिना पूरा किया ।उन्होंने तुरंत बेस कैंप में अपने कमांडिंग ऑफिसर को फोन किया और कहा कि ये दिल मेंगे मोर! “जो कारगिल युद्ध की कैचलाइन बन गया ।उस समय भारतीय सेना के प्रमुख जनरल वीपी मल्लिक ने व्यक्तिगत रूप से लेफ्टिनेंट को फोन किया था।विक्रम बत्रा और लेफ्टिनेंट बत्रा अब कैप्टन विक्रम बत्रा बन गए।

Captain Vikram Batra के कुछ वार्तालाप।

दुश्मन कमांडर से रेडियो conversation

प्वाइंट 5140 पर पहुंचने पर, वह एक दुश्मन कमांडर के साथ रेडियो एक्सचेंज में एक वार्तालाप हुआ, जिसने उसे चुनौती देते हुए कहा, ” शेर शाह आप क्यों आए हैं?” अब बापिस नही जा पाओगे। ” कैप्टन विक्रम बत्रा ने कहा है, ” एक घंटे के भीतर देखेंगे, शीर्ष पर कौन है।”

पिता के साथ सैटेलाइट फोन के जरिए वार्तालाप।

कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने पिता को सैटेलाइट फोन के जरिए फोन किया।उनके पिता बताते है कि वह बहुत तेज बोल रहा था और उसकी आवाज स्पष्ट नहीं थी। श्री गिरिधारी लाल बत्रा (कैप्टन विक्रम के पिता) ने केवल एक ये ही सुना “डैडी, मैं पर कब्जा कर लिया”। श्री जीएल बत्रा ने तुरंत सोचा कि उनके बेटे को पकड़ लिया गया शायद।

लेकिन कैप्टन विक्रम बत्रा ने तुरंत कहा “डैडी, मैंने दुश्मन की पोस्ट पर कब्जा कर लिया है। में ठीक हूँ”। यह श्री जीएल बत्रा के जीवन का सबसे सुखद क्षण था।

उसके बाद 29 जून, 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा का अंतिम फोन आया था। इस बार, वह एक नए मिशन को पूरा करने के लिए रवाना हुए थे।

A kargil hero

कारगिल युद्ध के लिए रवाना होने से पहले कैप्टन विक्रम ने कहा था। मैं या तो चोटी पर तिरंगा लहरा कर वापस आऊंगा या फिर उसमें लिपटे वापस आऊंगा । कैप्टन बत्रा भारतीय झंडे में लिपटकर घर वापस जरूर आए । लेकिन चोटीयों पर तिरंगा लहरा कर आये।

शत शत नमन है, उस भारत माँ के लाल को।

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