कृषक बिल पर आपकी राय और बेहतर सुझाव।

कृषक बिल पर आपकी राय और बेहतर सुझाव।

जय जवान जय किसान, का नारा दिया था , लाल बहादुर शास्त्री जी ने।
क्योंकि अगर जवान देश की रक्षा करता है तो किसान देश का पेट भरता है। आज वो ही किसान सड़कों पे क्यों उतर आया है। बात की गम्भीरता को समझना जरूरी है क्योंकि हमारे देश की 70 फीसदी जनता कृषि पर निर्भर है। इस में क्या ग़लत हैै? और क्या सही? हम आप सब के views जानना चाहते है और अगर आप इस बारे में नहीं जानते तो आपको भी जानने की जरूरत है क्योंकि देश का किसान सड़कों पे है।

किसान सड़कों पे क्यों है??

सबसे पहले हम आपको बता दें कि किसान भाई ये विरोध क्यों कर रहे है? वैसे तो हम सब जानते है कि सरकार द्वारा पारित कृषक बिल के विरुद्ध ये प्रदर्शन हो रहे है। जो कि ज्यादातर किसानों को सही नहीं लग रहा है। तो हम आपको बताएंगे कि ये कृषक बिल क्या क्या है ? किसानो को पक्ष क्या है? सरकार का पक्ष क्या है? और ये बिल कौन कौन से हैं? आप भी अपने विचार हमारे साथ सांझा करें की आप किस पक्ष में है? या आपको क्या सही लगता है?

पहला बिल

इस बिल के अनुसार अब किसान भारत मे कहीं भी अपनी फसल बेच सकता है। साथ ही एक राज्य के दूसरे राज्य के बीच कारोबार बढ़ाने की बात भी कही गई है। इसके अलावा मार्केटिंग और ट्रांस्पोर्टिशन पर भी खर्च कम करने की बात कही गई है।

किसानों का पक्ष

MSP खत्म हो जाएगा। क्योंकि  किसान अगर मंडियों में अनाज नहीं बेचेगा तो मंडियां खत्म हो जाएंगी। 

सरकार का पक्ष

MSP पहले की तरह जारी रहेगी। मंडियां खत्म नहीं होंगी। बल्कि वहां भी पहले की तरह ही कारोबार होता रहेगा। नई व्यवस्था से किसानों को मंडी के साथ-साथ दूसरी जगहों पर भी फसल बेचने का विकल्प मिलेगा। मंडियों में ई-नाम ट्रेडिंग जारी रहेगी।

दूसरा बिल

इस बिल के माध्यम से किसानो को कृषि संबंधित बस्तुएं और सुबिधाएं प्राप्त करने मे आसानी होगी।  किसान थोक बिकरेताओं से जुड़ेगा वो किसानों को अच्छे बीज और समय समय पर जागरूकता प्रदान करेंगें। किसान सीधे तौर पर अब थोक विक्रेता से अनुबंध कर सकता है । 

किसानों को पक्ष

अनुबंध करते समय छोटे किसान फसल का मूल्य अपने मन से नहीं कर सकते ।  किसानों का मानना है कि अगर कुछ गलत होता है या कुछ विवाद की स्थिति पैदा होती है तो उसका फायदा कंपनियों को  होगा क्योंकि किसान के पास इतना समय और पैसे नहीं होंगे की वो कंपनी से लड़ सके। 

सरकार का पक्ष

कॉन्ट्रैक्ट करना है या नहीं। इसमें किसान को पूरी आजादी रहेगी। वो अपनी इच्छा से दाम तय कर फसल बेच सकेंगे। देश में कई किसान उत्पादक समूह बन रहे हैं। ये समूह  छोटे किसानों को जोड़कर फसल को बाजार में सही कीमत दिलाने का काम करेंगे। विवाद की स्थिति में कोर्ट-कचहरी जाने की जरूरत नहीं होगी। स्थानीय स्तर पर ही विवाद निपटाया जाएगा।

तीसरा बिल

इस बिल में अनाज, दाल, तिलहन, खाने वाला तेल, आलू-प्याज को जरूरी चीजो की फहरिस्त से हटाने का प्रोविजन है। माना जा रहा है कि बिल के प्रोविज़न से किसानों को सही कीमत मिल सकेगी क्योंकि बाजार में मुकाबला बढ़ेगा।

किसानों को पक्ष

बड़ी कंपनियां आवश्यक वस्तुओं का स्टोरेज करेगी। इससे कालाबाजारी बढ़ सकती है।

सरकार का पक्ष

फसल खराब होने की आंशका दूर होगी। वह आलू-प्याज जैसी फसलें बेफिक्र होकर उगा सकेगा। एक सीमा से ज्यादा कीमतें बढ़ने पर सरकार के पास उस पर काबू करने की शक्तियां तो रहेंगी ही। इंस्पेक्टर राज खत्म होगा और भ्रष्टाचार भी।

 

तो ये थी कहानी

 

विरोध प्रदर्शन

केंद्र के इन नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों द्वारा निरंतर विरोध प्रदर्शन हो रहा है और इसी के तहत पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उतर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ किसान संगठनों ने मिलकर 26 और 27 नवंबर को दो दिवसीय रैली निकालने के लिए दिल्ली को तरफ कूच किया।

दिल्ली चलो

26 और 27 नवंबर को किसान बिल के विरोध में दिल्ली चलो protest में, अकेले पंजाब से दो लाख से अधिक प्रदर्शनकारियों सहित तीन लाख से अधिक किसान दिल्ली की सीमा पर पहुंच गए हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा सरकारों ने 100 से अधिक स्थानीय किसान नेताओं को गिरफ्तार करने, कई अन्य लोगों को हिरासत में लेने और राज्यों के माध्यम से आंदोलन को रोकने के लिए गंभीर दमनकारी उपायों को अपनाया है।

दिल्ली में कम से कम 720 किसानों को गिरफ्तार किया गया था। जब वे मजनू का टीला से राजघाट की ओर मार्च कर रहे थे। हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को हरि नगर के एक स्टेडियम में ले जाया गया।
इन सब के पीछे का कारण है कि किसान मांग कर रहे हैं, कि दिल्ली सरकार तीन कृषि कानूनों और बिजली बिल, 2020 को वापस ले।

राजनीति

वाम दलों ने गुरुवार को केंद्र की कृषि कानूनों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी की ओर बढ़ रहे किसानों पर पानी के तोपों और आंसू गैस का उपयोग करने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि इससे भगवा पार्टी के “किसान विरोधी चेहरे” का पता चला है।

हमारी राय

हमारी राय में जब तीन कृषि कानूनों को तैयार किया जा रहा था। तब केंद्र को एक चौथा कानून बनाना चाहिए था, अगर कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम में फसल की खरीद करता है तो ये एक दंडनीय अपराध होगा।

अब आप के इस विषय पर क्या विचार है हमारे साथ सांझा करें ताकि हम सरकार के आगे एक सही और अच्छा विकल्प रख सकें।

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Ashish thakur
Ashish thakur
2 years ago

1.MSP has neither tempered nor it was assured by govt in the past .it was given just to improve the financial condition of farmers . existence of MSP is not permanent as per any legislation of union govt .

2.second demerit of procurement of grains at MSP is that our already overflown granaries will overflow more .MSP will add more storing cost , transportation cost, maintenance costs to FCI .

Thriving Boost
2 years ago
Reply to  Ashish thakur

According to you what should be govt’s stance against it. How this issue may be resolve peacefully.

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