हिन्दी गीत | प्रियंका द्विवेदी की खूबसूरत रचना

हिन्दी गीत

 
   
जमाने से कबके गुजर गए होते , 
जीने से पहले ही मर गए होते! 
मिले  नही   होते   ज़िन्दगी  में आपसे,
तो कबके  मोतियों जैसे टूट के बिखर गए होते ! 
  
 नयनों   के   नीर   से  पीर पवित्र हो जाये,
 स्वाति बूँद चातक के लिए इत्र हो जाये।
 आओ सीख लो प्रेम की परिभाषा प्रिये,
 यह संसार कृष्ण द्रौपदी सा मित्र हो जाये! 
  
 कैसे  कह   दू  के  अपना  बना लो मुझे,
 आकर  के  कही  से चुरा  लो मुझे! 
 बहुत  कठिनाई है जीवन  में प्रिये, 
 सरल रास्ता  तुम  बना  लो मुझे! 
  
 खुसबू  बन सांसो  में  उतर जायेंगे,
 शगुन  बन कर हर जगह छाएंगे।
 महसूस करने की कोशिश कीजिये ,
 हम आपके पास ही नजरआएंगे! 
  
 रूप मेरा   बेकाबू छलक जायेगा,
 श्रृंगार बेकाबू सा बहक जायेगा!
 क्यों  अंधेरे   में  डूबे  हो   प्रिये,
 कभी उँजाला का दीपक जरूर आयेगा! 
  
 मेहंदी और  महावर भी आज उदासे है,
 आँखों के काजल भी अभी प्यासे है! 
 तेरे बिन सब सूना-सूना घर आँगन है, 
 आओ जाओ प्रिय अब तो टूटती सांसे है! 
  
 विगत  वर्षों  से  चल  रहा मन में कुछ उन्माद,
 नही पूरी हो रही मनुष्यता की प्यास। 
 क्या   करूँ  मै   मंथन  इसका,
 जहाँ  बची   ही   नही   कोई आस! 
            
स्वरचित- प्रियंका द्विवेदी 
 मँझनपुर कौशाम्बी 
 
   

Father’s Day कविता प्रतियोगिता का “परिणाम”

आप ऐसे ही आगे आने वाली प्रतियोगिताओं मे भाग लेते रहें। Thriving Boost आपकी आपकी लग्न और प्रतिभा पर लगातार अवलोकन करता है।

Father’s Day कविता पाठन प्रतियोगिता

Father’s Day 2021 के उपलक्ष पर Thriving Boost ने एक online कविता पाठन प्रतियोगिता का आयोजन किया था। जिसको बहुत सराहा गया। कोरोना महामारी के इस काल में ये एक बहुत ही अच्छा तरीका था पिता दिवस को मनाने का और अपने दिल की बात को अपने पिता तक पहुंचाने का। हमारी पूरी टीम आप सब का तहे  दिल से धन्यवाद करती है। आप के सहयोग से ही ये प्रतियोगिता सफल हो पाई है। सभी प्रतिभागियों ने उम्दा प्रस्तुति पेश की है लेकिन ये निर्णायक मण्डल की मजबूरी है की उन्हे सिर्फ 3 को ही चुनना था। आप ऐसे ही आगे आने वाली प्रतियोगिताओं मे भाग लेते रहें। Thriving Boost आपकी आपकी लग्न और प्रतिभा पर लगातार अवलोकन करता है। आपको आगे मौका जरूर मिलेगा।

परिणाम

हम सभी प्रतिभागियों को भाग लेने और प्रतियोगिता को सफल बनाने के लिए बधाई देते हैं। प्रतियोगिता में इंतजार की घड़ियाँ अब समाप्त होती है, अब बारी है परिणाम की।

प्रतियोगिता” के विजेताओं की सूची नीचे देखें:

प्रथम स्थान प्राप्त किया है।

फूल सिंह  

हिन्दी कविता प्रतियोगिता

फूल सिंह

पता- शकरपुर, दिल्ली

व्यवसास- सहायक विभाग अफसर

शिक्षा- एम-ए (इतिहास), एम ए (प्रशासनिक)

प्रकाशित पुस्तक- जीवन दर्शन, वक्त और बदलते परिवेश, नारी एक प्रेरणा स्रोत, युगांतर आदि

दूसरा स्थान प्राप्त किया है

शालिनी शर्मा  

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी

शालिनी शर्मा”स्वर्णिम”

पता – इटावा,उत्तर प्रदेश

उम्र-40 साल

पेशा- लेखन कार्य

तीसरा स्थान प्राप्त किया है।

सुनील कुमार

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी

सुनील कुमार

उम्र – 39 वर्ष

शिक्षा- एम.एस-सी.,एम.एड.

व्यवसाय- अध्यापन

पता- बहराइच,उत्तर प्रदेश।

कविता जो Thriving Boost की वार्षिक पत्रिका के लिए चुनी गई है।

उपासना थापा

शाम्भवी टण्डन

शालिनी शर्मा

अनुज गुप्ता

सभी विजेताओं को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

हमारी टीम धन्यवाद करना चाहती है दो छोटी बालिकाओं शाम्भवी टण्डन  और Yatishree Raghuvanshi का जिन्होंने ग्रुप A में बहुत ही उम्दा प्रदर्शन किया है।

father's Day competitions
Yatishree Raghuvanshi
हिन्दी कविता प्रतियोगिता
शाम्भवी टण्डन

सिर्फ दो ही प्रतिभागी होने की बजह से हम ग्रुप A का परिणाम घोषित नहीं कर पाए। लेकिन हम दोनों छोटी बालिकाओं का अभिनंदन करते है उन्हे शुभकामनाएं देते है और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते है।

प्रमाण पत्र

सभी प्रतिभागियों के प्रमाण पत्र अपलोड कर दिए गए है। आप नीचे दिए गए लिंक पर जा कर अपना प्रमाण पत्र download कर सकते हो।

Note : जिन प्रतिभागियों की कविताएं वार्षिक पत्रिका के लिए चुनी गई है कृपया अपनी कविता हिन्दी में टाइप करके Thriving Boost के official WhatsApp नंबर पर भेज दें।

संस्कृति – देश की पहचान | रौशन कुमार

रौशन जी की यह कविता भारत की युवा पीढ़ी की वास्तविकता पर चोट करती है, हो सकता है किसी मित्र को बुरा लगे तो मै क्षमा चाहूंगा , लेकिन जो सच है , उसे बयां करना भी जरूरी था।

शीर्षक -“संस्कृति – देश की पहचान”

जवां दिल और जवां मौसम संग

लूट गई आज जवानी भी

शर्मो- हया की बातें करना

अब लगता है बेमानी भी

पश्चिम के प्रभाव से भैया

कपड़े हो गए छोटे जी

थोड़ी सी हया भी बच जाती

गर जो घुंघट होते भी

सभ्य समाज की संकल्पना

कैसे बूढ़ा बाप करे

भरी सभा में गर बेटी ही

खुल्लम- खुल्ला नाच करे

ताका- झांकी में लगे रह कर

बिगड़े बाप के बेटे भी

बिक गई पुरखों के धरोहर

जेवर , मकान और खेतें भी

हरी – भरी दुनिया में लाकर

जिसने तुम्हे संवारा है

देव स्वरूप पूजन के बदले

तुमने उन्हें दुत्कारा है

मत भूल तुम उस  भारत के बेटे हो

जिसने दुनिया को ज्ञान दिया

तुम लड़ते हो भाई- भाई में

उसने दुश्मन को सम्मान दिया

ये भटकी हुई राहों की यारों

छोटा सा परिणाम है

छोटा सा परिणाम है

जो हो रहा अविराम है

निंदा नहीं भगिनी- बन्धु की

पर , उनसे ये अरमान है

अपनाओ सभ्यता – संस्कृति अपनी

क्यूंकि, संस्कृति ही देश की पहचान है

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी

रौशन कुमार “प्रिय”

गांव – सोंधी,

पोस्ट – शरमा, जिला -लखीसराय, बिहार

पिता दिवस पर विशेष By Pratishtha Sharma

“पिता दिवस पर विशेष” कविता प्रस्तुत कर रही है “प्रतिष्ठा शर्मा” जी। पिता की भूमिका को क्या बखूबी वर्णित किया है।

पिता दिवस पर विशेष

जीवन की टेढ़ी – मेढ़ी पगडंडियों पर,

 जिसने चलना सिखाया है।

 काँटों पर खुद चलकर,

हर चुभन से मुझे बचाया है।

जिनके स्पर्श से सदैव,

एक सुकूं-सा दिल को होता है।

वो तब – तब मेरे समीप होते हैं,

जब – जब ये दिल रोता है।

जिनकी स्मृति अधरों पर,

अश्रुपूर्ण मुस्कान ला देती है।

एक ठंडी श्वास.. एक आस,

एक विश्वास जगा देती है।

हर रिश्ते से परे ये अह्सास करा देती है।

कि.. तू आज भी अपने पिता की ही बेटी है,

आज जो कुछ भी जीवन में पाया है,

वो सब उन्हीं का सिखाया है।

वो सशरीर भले ही साथ न हों,

लेकिन मुझपर..सदैव उनका साया है।

सब कुछ होते हुए भी हृदय में,

एक रिक्तता का अह्सास होता है।  

और कभी – कभी ‘ ये ‘ आभास होता है।

कि काश! काश,

अपने जीवन की माला में कुछ..

और मोती पिरोती कुछ…

और बचपन होता कुछ

और.. खुशियाँ होतीं

 ग़र आज ‘ वो ‘ साथ होते

तो.. कुछ और बात होती ।

पर्यावरण की गुहार | आभा सिंह की खूबसूरत रचना

कविता

पर्यावरण दिवस पर “आभा सिंह” की रचना “पर्यावरण की गुहार” में बहुत ही खूबसूरत तरीके से व्याख्यान किया है, कि प्रकृति मानव से क्या कहना चाहती है? हमे इसे आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर कर रखना है नहीं तो हमारी आने वाली नसलें इस प्रकृतिक सौन्दर्य को नहीं देख पायेंगी।

शीर्षक- पर्यावरण की गुहार

सुरभित -  मुखरित  पर्यावरण की  यही गुहार, 
सुन  लो  मानव  मेरी  पुकार... 
करो  ना  मुझपे  घातक   प्रहार, 
हरे - भरे  पेड़ पौधों  को  नष्ट  करके, 
मत  उजाड़ो मेरा  संसार... 
मैं  पृथ्वी का  जीवन दाता, 
मैं  ही  उसका  भाग्य- विधाता.. 
करने  हैं  मुझे  सब  जीवों  पर  उपकार, 
मत  करो  मेरे  पहाड़ो  पर  विस्फोटक  वार.. 
सुन्दर  सुरभित बाग और  बगीचे मेरे, 
हे  मानव! य़े  सब  काम  आयेंगे  तेरे.. 
मेरी  धरा  पर  पला  बढ़ा  तू, 
फिर  से  कर  ले  तू  विचार... 
कुछ  ना  बचेगा  अगर धरा  का आवरण छूटा,
और  मेरे  सब्र  का  बाँध  टूटा... 
मेरे  साथ  अगर  अन्याय  करोगे,
तो  न्याय  कहाँ  से  पाओगे.. 
सुरभित उपवन व  मुखरित  झरने, 
कहाँ  से  लाओगे.... 
आज़  लेकर  एक  नया  संकल्प,
करेंगे  वसुंधरा का  श्रृंगार..
देकर  नवजीवन  इस  पर्यावरण को,
कर  सकेंगे  सबका  उद्धार...
सुरभित - मुखरित पर्यावरण की  यही  गुहार.. 
सुन  लो  मानव  मेरी  पुकार..!!

स्वरचित-

आभा  सिंह

लखनऊ,उत्तर  प्रदेश

प्रकृति कितनी सुंदर | फूलेन्द्री जोशी की खूबसूरत रचना

पर्यावरण दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं ।🙏🙏🙏। आज की मेरी कविता प्रकृति पर आधारित है। कृपया मुझे शब्दो की गलतियो पर क्षमा कीजिए।

प्रकृति कितनी सुंदर

पर्यावरण दिवस पर “फूलेन्द्री जोशी” की रचना “प्रकृति कितनी सुंदर है” में बहुत ही खूबसूरत तरीके से प्रकृति का व्याख्यान करती है। लेकिन मानव ने किस तरह से इसका सर्वनाश कर दिया है। हमे इसे आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर कर रखना है और उसके लिए भी हमे क्या करना है? कवि फूलेन्द्री जोशी जी ने अपनी इन पंक्तियों मे बताने की कोशिश की है।

प्रकृति की लीला भी न्यारी है। 
जो कितनी सुंदर और प्यारी है। 
कही पहाड़ कही नदियां है। 
कही बर्फ झरने की खूबसुरत वांदियांहै। 
कही विशाल मैदान तो कही सागर है। 
कही सूखा रेत तो कही घने वृक्षो के नागर हैं। 
कही  हवा की शीतलता,तो कही घनघोर बौचार है। 
कही शांत एकांत वातावरण, तो कही वातावरण का कोलाहल है। 
स्वर्ग जैसी लगती है ये  धरती सारी है। 
प्रकृति की लीला भी न्यारी है। 
पर मानव ने प्रकृति को उजाड़ जो दिया है। 
ऐसा लगता है प्रकृति का चिरहरण हुआ है। 
अगर मानव पर्यावरण पर प्रदूषण ना फैलाये, 
सारे मिलकर प्रकृति की सौंदर्यता को बचाये। 
हम मिलकर ये संकल्प करे की पेड़ पौधे खूब लगाये।
प्रकृति के प्रति जो हमारा फर्ज है। हम उसे निभाये। 
तभी तो प्रकृति की रक्षा करने की जिम्मेदारी  हमारी है। 
प्रकृति की लीला भी न्यारी है। 
कितनी सुंदर और प्यारी है।

फूलेन्द्री जोशी तितिरगांव(जगदलपुर)। जिला_बस्तर(छ. ग.)

कभी तुम चुप रहो, कभी मैं चुप रहूँ।

“कभी तुम चुप रहो, कभी मैं चुप रहूँ” मंजू लोढ़ा द्वारा रचित बहुत ही खूबसूरत रचना है। जिसमे उन्होंने प्यार के अहसास को उजागर किया है। जिसमे बातें नहीं सिर्फ एहसास होता है। प्रेम रस से भरपूर ये कविता आपको आपके प्यार की याद जरूर करवाएगी।

कभी तुम चुप रहो, कभी मैं चुप रहूँ।

कभी तुम चुप रहो,
कभी मैं चुप रहूँ,
कभी हम चुप रहें
खामोशियों को करने दो बातें,
यह खामोशियाँ भी बहुत कुछ कह जाती हैं,
जो हम कह न सकें वह भी कह जाती हैं।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें‌।
आओ आज युंही बैठे
एक-दुजे की आंखो में डुबे
उस प्यार को महसुस करे
जो जुंबा पर कभी आया ही नहीं।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें।
आओ हम तुम नदी किनारे
हाथों में हाथ दे चहलकदमी करें
मुद्दतों से जो सोया था एहसास
उसे तपिश की गर्माहट को महसुस करें।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें।
आओ आज छेडे, ऐसा कोई तराना
जो धडकनों में बस जाये
बिन गाये, बिन गुनगुनाये
संगीत की लहरियों में हम डुब जाये। कभी तुम------
चुप रहना कोई सजा नहीं
चुप रहना एक कला है,
जो बिना कहें सब कुछ कह जायें
वह प्यार तो पूजा है।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें।
मंजू लोढ़ा ,स्वरचित-मौलिक

हिन्दी कविता जीवन

हिन्दी कविता “जीवन” फूलेन्द्री जोशी द्वारा लिखी गई है। जीवन को गणित से जोड़ कर जीवन की परिभाषा समझाने की एक बहुत अच्छी कोशिश है। जिस तरह गणित सभी को समझ नहीं आता जीवन भी को भी समझना हर किसी के बस मे नहीं।

।।जीवन।।

जीवन एक गणित हल करना सबको पड़ेगा।

जो ना इसे हल करे तो वो आगे कैसे बड़ेगा।।

जीवन में खुशियो को जोड़े जाते हैं,

और गम को घटाये जाते हैं,

दोस्तो को गुणा करते हैं,

और दुश्मनो को भाग दिये जाते हैं।

जो शेष फल में आता हैं,

उसी को सही माना जाता है।

जो इस सवाल को सुलझाये वही आगे बड़ेगा।।

जीवन एक गणित………………..,……………।

गणित की तरह आते हैं छोटे बड़े केचिन्ह,

जीवन में संख्या की तरह सम विषम,और अभिन्न भी होते हैं।

जीवन में। कभी करोड़ो का फल मिलता है।

तो कभीहमारा भाग्य शून्य रह जाता हैं।।

शेष फल देखकर यही जीवन है,

ऐसा सबको लगता है।।

जिसे होता है जीवन का अनुभव वही इसको समझेगा।

जीवन एक गणित ………………………………….।।

लंबाई और चौड़ाई की तरह जीवन भी लंबा चौड़ा होता है।

कभी बिंदू की तरह थम जाता है,

और कभी गोलाई की तरह घुम जाता है।

जीवन के पहलु को किलो ग्राम के तरह तौला जाता है,

तो कभी लीटर की तरह बांटकर,

मीटर की तरह नापा जाता है।

जो इस सवाल को समझे,

वही इसको हल करेगा।।

जीवन एक गणित है हल करना सबको पड़ेगा।।

कवि
फूलेन्द्री जोशी, तितिरगांव(जगदलपुर)। जिला_बस्तर (छ.ग.)

मैं एक नारी हूँ। मंजू लोढ़ा द्वारा रचित कविता

“मैं एक नारी हूँ” मंजू लोढ़ा द्वारा रचित बहुत ही अच्छी कविता है। बहुत हुआ हक और सम्मान मांगना अपनी इस कविता मे मंजु जी ने समझ को ये समझाने की कोशिश की है कि अब नारी इस काबिल हो गई है कि वो अपना हक छिन के ले सकती है। नारी की खामोशी को उसकी मजबूरी ना समझा जाए।

मैं एक नारी हूँ।

सदियों से अपनी परंपराओं को निभाया हैं,

उसके बोझ को अकेले ढोया हैं,

इस पुरूषप्रधान समाज ने हरदम

हमको दौयम दर्जे पर रखा है,

अपनी ताकत को हमपर आजमाया है।

पर अब मुझे दुसरा दर्जा पसंद नहीं

मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूँ।

हक और सम्मान के साथ रहना चाहती हूँ।

मेरी सहृदयता को मेरी कमजोरी मत समझो।

मैं परिवार को न संभालती,

बच्चों की परवरिश न करती,

बुर्जुंगो की सेवा न करती,

पति को स्नेही प्रेम न देती,

तो क्या यह समाज जिंदा रहता?

मै कोमल हूँ, पर कमजोर नहीं,

अगर कमजोर होती तो

क्या यह नाजुक कंधे हल चला पाते?

पहाड़ों की उतार- चढा़व पर काम कर पाते?

घर और बाहर की दोनों दुनिया क्या यह संभाल पाते?

मेरे त्याग को तुमने मेरी कमजोरी समझ लिया,

घर-परिवार बचाने की भावना को मेरी मजबुरी समझ लिया।

अगर नारी पुरूष के अहंम को न पोषती,

तो पुरूष आज कहाँ होता?

पुरूष के बाहरी दुनिया के परेशानियों को वह न हरती,

तो पुरुष कहाँ होता?

हमें तो परमात्मा ने अपने गुणों से रंगा है

अपनी भावनाओं से हमें गढ़ा है

इसलिये हम सिर्फ कल्याण करना चाहती है,

इसलिये पुरूष से कई-कई पायदान उंची होकर भी

उनके सामने नतमस्तक हो जाती हैं।

झगडना हमें पसंद नहीं

इसलिये हम सिर्फ स्नेह-ममता-प्रेम

बांटती है-फिर कहुंगी

इसे हमारी कमजोरी मत समझो,

घर की आधारशिला समझो।

मुझे बिल्कुल पसंद नहीं कि

जिस घर को मैनें अपने खून सें सींचा

उसपर मेरा अधिकार ही नहीं

नाम पट्टिका

पर मेरा नाम नहीं।

अब घर हम दोनों का सांझा होगा,

नेम प्लेट पर सिर्फ मेरा ही नाम होगा।

मुझे कतई पसंद नहीं कि

मैं अपनी पसंद का भोजन न करूं

अपनी मर्जी से कहीं आ-जा न पाऊँ।

अब मैं भरपूर ,पल पल जीना चाहती हूँ।

हवाओं में उड़ना चाहती हूँ

सारे बंधन ,सारी पाबन्दियों की

बेडियों को तोड़, मुक्त आकाश में

स्वच्छंद पक्षी की तरह उड़ना चाहती हूँ।

मै सिद्ध कर चुकी हूँ-अपने आप को,

अब कोई अग्निपरीक्षा

नहीं, कोई जंजीरों की बेड़ियां नहीं,

परिवार की जिम्मेदारियों के साथ

खुद के प्रति जिम्मेदारी निभाना चाहती हूँ।

खुद की मनपसंदा बनकर, खुद की पीठ थपथपाकर,

हरदम खुश रहना चाहती हूँ।

मुझे पसंद नहीं सिर्फ

तुम्हारी तकलीफों को सुनुं

सिर्फ तुम्हारे दुःख की भागीदार बनुं,

अब मैं तुम्हारे सुख में सांझेदार होना चाहती हूँ।

घर के सभी मसलों में मेरा भी मत रखना चाहती हूँ।

मुझे तुम अनदेखा अब न कर पाओंगे।

हर कदम पर मेरी उपस्थिती दर्ज रहेंगी।

सोच लो आज से हम,

हर कदम, हमसफर है,

जितना जीने का तुमको हक

उससे कम मुझे स्वीकार नहीं।

युद्ध क्षेत्र से लेकर

आसमानी यात्रा में

हमने अपना परचम फहराया है।

अपनी बुद्धीमत्ता का लोहा मनवाया है।

दुनिया को दिखलाया है

किसी से हमारा कोई मुकाबला नहीं

क्योंकि हम किसी से कम नहीं।  

 

मंजू लोढ़ा द्वारा रचित

हिन्दी कविता और हिन्दी साहित्य