शहीद दिवस 2021 कविता

शहीद दिवस 2021 के उपलक्ष्य पर अनुष्का रघुवंशी द्वारा रचित कविता। हमे उन शहीदों की बहादुरी से अवगत करवाती है।

मिट गये इस देश पर ना जाने कितनी माताओं के लाल,

हमारी खुशी के लिए ना जाने कितनी बहनो के अश्क बनकर बह गये उनके भाई,

हमारी निंदो का सौदा कर गये वो अपनी जान से,

आज है मौक़ा हम करेगे उन्हें याद,

आज दोहराएंगे हम वो पुराने राग,

कहते हैं खुदा का देखा नहीं है किसी ने साक्षात्कार,

अरे वो क्या कम हैं किसी परवरदिगार से,

जो जान हथेली पर ले लड गये गौरो के लिये अपने काल से,

सीने पर गोली खाई,

होठों से उनके उफ्फ भी ना आईं,

छोड़कर अपनी माँ का आंचल,

सदा के लिये सो गये गोद में भारत माँ की,

दिलाने हमें आजादी,

खौफ को मात देकर वो शहीद हो गये,

वो वीर जवान ही है जो भारत माँ के नाम अपनी जान लिख गये।

Anushka (siya) Raghuwanshi

शहीद

शाहिद दिवस के उपलक्ष्य पर मीनू गोयल की ये पंक्तियां आपको अंदर तक हिला देंगी। हम क्या से क्या हो गए हमे बता देंगी।

एक बहुत छोटा सा नन्हा सा शब्द ही तो है

पर प्रभाव ,भूमिका, तत्परता, देशभक्ति, शौर्य, त्याग 
की पराकाष्ठा से ओतप्रोत है।
 जब छोटी थी ,शहीद का नाम हो और भगत सिंह
 का नाम याद ना आया हो यह कभी नहीं हुआ। 
एक पुलक सी, सिहरन सी रगों में दौड़ जाती थी
जब देशभक्ति के दीवानों की कहानी सुनाई जाती थी। 

आज के परिप्रेक्ष्य में और नई पीढ़ी के विचारों की बात की जाए तो उनकी नजर में शहीद एक सामान्य सा शब्द होकर रह गया है। उन्हें लगता है शहादत कोई भी दे सकता है, कितनी गलत सोच और भावनाएं हैं पर इन सब के लिए कहीं ना कहीं हम सब ही तो दोषी हैं। संयुक्त परिवार टूटे परंपराएं टूटी देश प्रेम की कहानी छूट गई धर्म और देश अभिमान बस कथाओं और इतिहास में छिप कर रह गया

कहीं कोई आंदोलन हो रहा, कहीं जाम लग रहे, कुछ भी गलत हो रहा और वहां कोई किसी भी कारण से अगर मृत्यु को प्राप्त कर लेता है तो “शहीद हो गया” की हेड लाइन के साथ अखबार की सुर्खियां छ्प  जाती हैं कोई फर्क नहीं पड़ता

अभी शहीद शब्द को पढ़कर ना अश्रु धारा ना संताप 
ना पूजा ही फड़कती है ना श्रद्धांजलि दी जाती है
शहीद एक शब्द ही तो नहीं है, भगत सिंह और 
उनके साथियों की कुर्बानी है। 
हर भारतवासी की सीने में जलती आजादी की चिंगारी है।

अभिभूत हो जाती हूं मैं जब इनकी वीरता और देशभक्ति के जज्बे से भरी इनकी जीवनी पढ़ती हूं। सारे सुखचैन, घर परिवार, रिश्ते- नाते किसी भी सांसारिक सुख से जो नहीं भरमाए l
बस भारत माता और स्वतंत्रता जिनका सिरमोर थी ।धन्य है वे शहीद और उनकी शहादत।

अंत में इतना ही कहूंगी,

जन -जन के मानस में क्रांति की मशाल जलाने वाले थे,
कैसे भूलू उनकी शहादत
वह मेरे देश की शान के रखवाले थे।
इंकलाब जिन्दाबाद।

मीनू गोयल

मीनू गोयल

प्रतिभागी “मधु खोवाला”

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “मधु खोवाला” द्वारा रचित कविता “बड़ी दिलकश है चाय “। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "मधु खोवाला"

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "मधु खोवाला" द्वारा रचित कविता "बड़ी दिलकश है चाय"।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

बड़ी दिलकश है चाय

 

पूछा  किसी ने चाय के होते हैं कितने प्रकार, मैंने जवाब दिया- सैकड़ो ,हजार। दूध- वाली और लीकरवाली

तो अब पुरानी हो गई।

ग्रीन टी के कलेवर में फैले हैं आज   हजारो  फ्लेवर। थोड़ी सी  फेर बदल करके मार्केट में जाल सा छा गया है , जिसमें आम आदमी फॅस कर रह गया है। अपनी तो कुल्हड़ वाली चाय ही असली चाय है

जो मुझे है पसन्द।

  अग्नि परीक्षा में तपाई गई ,चूल्हें पर चढाई गई। पत्नी की मोहब्बत सरीखी पाक है चाय।

 कभी मीठी,कभी फीकी

कभी तीखी है चाय। तभी तो कहते हैं कुल्हड़ की चाय होती है- चरित्रवान। जिसके लिए पड़ोसी जाती है उसीको हो जाती है समर्पित ,

कुल्हड़ की चाय। किसी

  एक के होठों से लग कर रह जाती है चाय। बड़ी दिलकश, बड़ी

दिलरूबा, होती है चाय।

 

 

 

लेखक/ कवि – मधु खोवाला
उम्र –  60 yrs                      
 Profession: Homemaker
निवासी – बुध मार्ग, पटना    

प्रतिभागी “सविता माली “

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “सविता माली ” द्वारा रचित कविता “ठंडी हवा”। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "श्रीमती सविता माली "

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "श्रीमती सविता माली " द्वारा रचित कविता "ठंडी हवा "।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

*ठंडी हवा*

 

देखो जरा ! ठंडी हवा 

भी क्या मदमस्त होकर

 चल रही।

किसी का भी भय नहीं

 है जिसे।

चंचलता है स्वभाव

 जिसका।

कभी विशाल वृक्षों से 

गुपचुप बातें करती हैं,

तो कभी इठलाती हुई 

मेरे घर में टंगे पर्दों को 

छेड़ा करती हैं।

यह खुश भी आज

 बहुत है, 

लगता है जैसे नदी में

 गोते लगाकर आई है।

शीतलता से लिप्त है यह ।

 तभी तो तीक्ष्ण ग्रीष्म

 ऋतु में राहत  प्रदान कर 

रही ।

आज मुझसे भी बातें 

करने लगी है ये देखो।

कभी मेरे केशों के साथ

 क्रीडा कर रही ।

तो कभी मेरे छत पर टंगे 

कपड़ों को खुद के

 साथ उड़ा रही।

आकाश में उड़ रहे

 पतंगों को मानो और

 भी गति देर रही।

दे रही संदेश जैसे

 संघर्षों से थककर हार

 मारना ही जीवन नहीं।

कुछ भी हो , तू खुश रह ।

हार के बाद भी,

 तू फिर से उठ ,

नए जोश और उमंग

 के साथ।

खुद ही दे खुद को 

हौसला तू।

स्वतंत्रता और निर्भयता

 का पाठ 

पढ़ा रही यह देखो।

तभी तो मंदिर के छत पर 

लगे विशाल ध्वज को 

भी स्फूर्ति से लहरा 

रही।

देखो जरा! ठंडी हवा

 भी क्या मदमस्त होकर 

चल रही।

 

 

लेखक/ कवि  – श्रीमती सविता माली
निवासी – प्रयागराज                           

 

प्रतिभागी “दिलखुश धाकड़”

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “दिलखुश धाकड़” द्वारा रचित कविता “ठंड”। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "दिलखुश धाकड़"

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "दिलखुश धाकड़" द्वारा रचित कविता "ठंड"।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

 ठंड

भारत भूमि की ये एक विशेषता

इसको मिली है सभी तीनों ऋतुओं की श्रेष्ठता।

एक सर्द सुबह का,सुंदर सा नजारा।
घना सा कोहरा और मुँह से निकलता धुआँ।
ठिठुरता बदन,
सूर्य देव के आगमन की दुआ।
औस की बूँदों का टपकता पानी,
जीवन में नयी ऊर्जा भर देता है।

ठंड एक सर्द एहसास की याद दिलाती है,

मन में एक सिहरन सी दौड़ जाती है।

ठंड में दिल हिमालय की वादियों में खो जाता है,

रजाई की गर्मी और रसोई की खुशबू में डूब जाता है।

ठंड भारतीयों को देती है लुफ्त स्वाद का,

शरीर  को देती है एक मौका सुधार का।

परिवार को देती है मौका,

शाम को जल्द मुलाकात का ।

ठंड मां को देती है सुख,

क्रिसमस और दिवाली की छुट्टियों में,

सभी बिखरे परिवार को बुलाने का।

ठंड बच्चों को देती है मौका,

त्योहारों से मुलाकात का ।

खिलखिलाने का गुनगुनाने का,

कुछ और चटपटा से खाने का।।

ठंड कभी कहीं रूला भी देती है उन बेसहारों को,

जिन्हे जीना पड़ता है अभावों में सर्द रातों में ।

ठंड ले आती है

रबी की फसल का सुख,

दिवाली का सुकून

सीजन और

नए वर्ष का आह्वान।।

लेखक/ कवि  – दिलखुश धाकड़
उम्र   – ४२ वर्ष                             
पेशा – गृहिणी                             
निवासी – इंदौर( मध्य प्रदेश)       

प्रतिभागी “नमिता गुप्ता “

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “नमिता गुप्ता” द्वारा रचित कविता “तापस हुए पहाड”। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "नमिता गुप्ता "

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "नमिता गुप्ता " द्वारा रचित कविता "तापस हुए पहाड"।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

 तापस हुए पहाड

धुंध का मौसम हुआ, सूरज गया शर्माय ।
देखकर ठंडा अलाव,लिहाफ गया घबराय।।

पर्वत भी ध्यानस्थ हुए, नदियां हो गई मौन।
हरियाली भी हुई धवल,  बंसी बजाए कौन।।

सूरज की अपनी अकड़, सर्दी करे प्रहार।
हाड़ कंपाती ठंड ने, सबको किया बीमार ।।

सन्नाटा पसरा हुआ ,सड़के हुई विरान ।
हाथ बांधे जेब में, दुबके हुए मकान।।

दिन चूल्हे की आग सा, राते लंबी ताड़।
मौसम ने करवट बदली, तापस हुए पहाड़।।

शीत लहर चल रही, मौसम हो गया सर्द।
सहम घर में कैद हुए, क्या नारी क्या मर्द?

धूप गुनगुनी हो गई ,मौसम ने ली अंगड़ाई ।
खेतों ने ओढ़ी चुनर, छाई बसंत तरूणाई।।

 

लेखक/ कवि  – नमिता गुप्ता, 
उम्र – 55 बर्ष                           
     निवासी – त्रिवेणी नगर, लखनऊ

 

प्रतिभागी “आभा”

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “आभा” द्वारा रचित कविता “आज का दिन”। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "आभा"

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "आभा " द्वारा रचित कविता "आज का दिन "।
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‘आज का दिन’

 

कुहरा है,

आज धूप उदास है-

बचे खुचे सवालों के हल

ठंडी हवा के पास हैं।

 

पतझड़ की जुबां में

बूढ़े ज़र्द पत्ते आँगन में बैठे

आज बतिया रहे हैं

बर्फ़ हो रहे बदन में ये आदमी

गर्मी कहाँ से ला रहे हैं ?

जो सर्दी में भी इतरा रहे हैं !

 

क्या पता आज भी-,

कमरे में खामोश बैठे

झाँकते अलसाते लिहाफ़

खाली बैठे ताकेंगे दिन भर

बुझी हुई आँच का धुआँ !

राख हो चुकी होंगी

शाम तक

सूखे ठूंठों की जवानियाँ ।

 

 

लेखक/ कवि – आभा          
उम्र (Age) – 29 वर्ष            
              पेशा – भारतीय स्टेट बैंक में कार्यरत
   निवासी – रुड़की, उत्तराखंड

 

प्रतिभागी “निर्मल वत्स “

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “निर्मल वत्स” द्वारा रचित कविता “ठण्ड, चाय और तुम”। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "निर्मल वत्स"

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "निर्मल वत्स" द्वारा रचित कविता "ठण्ड, चाय और तुम"।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

ठण्ड, चाय और तुम

 

तुम समेट चले लाल चादर,

श्वेत वर्ण में शाम -सीआई मैं ।ठंडी -ठंडी सर्द हवाएँ,

देख तनिक घबराघबराईई मैं ।

 

 मुरझाए क्यों पेड़ खड़े हैं ,

 बुझे -बुझे क्यों हुए सुमन।

 पत्थर कैसे पानी हो रहा,

 नदियों में आई अकड़न ।

 

पत्तों पर मोती बिखरे हैं ,

मेरे आने से चमक रहे ।

तेरे जाने से सर्द रात है ,

विरह के ऑंसू टपक रहे।

 

तू संग था तो ठंड प्रिय थी,

अब दुश्मन -सी लगती है ।

तेरे बाहों के घेरे बिना,

ठंड अकड़न- सी लगती है।

 

 घना कोहरा सर्द हवाएँ,

 तेरे विरह के जैसे हैं ।

 मेघ हटा प्रकाश फैला दे,

 तुम ही भानु जैसे हो।

 

 ठंड चाहे मौसम की हो ,

 या फिर दिल में आ जाए।

 दोनों के लिए आग जरूरी ,

 जो ठंड को पिघला पाए।

 

 क्या जल्दी थी जाने की,

 तनिक एक पल रुक जाते।

 एक प्याला चाय का प्रिय ,

 बैठ मेरे संग पी जाते ।

 

चाय तो सिर्फ बहाना था, तुमको पास बिठाना था ।

तेरी सांसों की गर्मी से,

सर्दी को दूर भगाना था।

 

अदरक और इलायची से मिल, चाहे गजब की बन जाए ।

तन से ठंड को दूर भगाए , दिल से दिल तक हो आए ।

 

 इस ठंड में एक प्याला चाय,

 निर्मल हाथों की तुम पी लेते।

 बिरहन को संजीवनी मिलती,

 पल में जिंदगी को जी लेते।

 

 

 

 

लेखक/ कवि –   निर्मल वत्स     
व्यवसाय – अध्यापन और लेखन
उम्र – 51                                    
निवासी –  सोनीपत,हरियाणा   

 

प्रतिभागी “ललिता पांडे”

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “ललिता पांडे” द्वारा रचित कविता “तुम्हें मालूम है”। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "ललिता पांडे "

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "ललिता पांडे " द्वारा रचित कविता "तुम्हें मालूम है "।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

तुम्हें मालूम है

तुम्हें मालूम है न ये ठंड जब भी आती है

यादों की बारात संग लाती है

ये मुझे बहुत प्यारी लगती है तुम्हारी तरह

या यू कहो ये ठंड नही तुम ही हो

जो मेरे इर्दगिर्द घूम 

मुझे अपने होने का एहसास दिलाती हो

और फिर गर्म चाय की चुस्कियों के साथ

धुंआ सा बन उड़ जाती हो।

 

तुम्हें मालूम है तुम ठंड में 

और मासूम और प्यारी लगती थी

जब ओढ़ कर बर्फ सी श्वेत रजाई तुम 

मेरे लिए भी थोड़ी सी जगह बनाती थी

यकी मानो 

ये ठंड यही रोक लेने का मन करता था

तुम्हारी बुनी स्वेटर जो आज भी 

ठंड से मुझे बचाती है

ये हरपल तुम्हारे मेरे पास

होने का एहसास दिलाती है।

 

 

लेखक/ कवि – ललिता पाण्डेय
निवासी – दिल्ली                      

 

प्रतिभागी “अर्चना सिंह जया  “

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी “अर्चना सिंह जया ” द्वारा रचित कविता “यही प्यार है “। अगर आप मे भी है ऐसी प्रतिभा तो जल्दी से भाग ले और जीते धन राशी, उपहार साथ मे प्रमाण पत्र।

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी "अर्चना सिंह जया  "

हिन्दी कविता प्रतियोगिता की प्रतिभागी "अर्चना सिंह जया  " द्वारा रचित कविता "यही प्यार है "।
अगर आप भी अपनी प्रतिभा दिखाना चाहते है तो आपका स्वागत है। ये प्रतियोगिता निशुल्क है। विजेताओं को इनाम और गिफ्ट दिए जाएंगे। भाग लेने के लिए नीचे दिए गए बटन पे क्लिक करें।

 “यही है प्यार”

बरखा की पहली बूंद का स्पर्श,

प्रथम मिलन की याद ताजा करती।

बसंती बयार के शीतल स्पर्श,

तन-मन में हर्षोल्लास है जगाती। 

शायद यही प्यार है और क्या कहूं ? 

 

नील गगन पर छाते मेघ, 

मन मयूर नृत्य करते हैं यह देख। 

जब उठते क्षुब्ध हिय की प्यास,

विचलित करती मधुर मिलन-आस। 

शायद यही है प्यार और क्या कहूं ?

 

मिलन विछोह में गज़ब की बात,

पलकें गीली होती हैं हर बार।

कुछ मिलते-जुलते हैं ख्यालात,

बिन कहे समझने लगे जज़्बात।

शायद यही है प्यार और क्या कहूं ?

 

दूर उनसे रह नहीं सकती,

पास रहो तो होती है तकरार।

जब नज़रों से दूर जाते वो,

दिल में कशिश है जगती हरबार।

शायद यही प्यार है और क्या कहूं ?

 

 अनोखे बंधन का है एहसास,

 इक इक लम्हा है जैसे ख़ास।

 लबों से बयां नहीं किया कभी,

नज़रों नज़रों में ही होती है बात।

शायद यही है प्यार और क्या कहूं?

 

ठंड में गर्मी और गर्मी में ठंड

जब कभी होने लगे एहसास।

कुदरत का करिश्मा है ये या 

जग उठे, सोए हुए जज़्बात।

शायद यही है प्यार और क्या कहूं।

 

तबियत हो जाए गर नासाज़,

माथे पर फेरकर अपने हाथ।

मधुर शब्दों का मरहम लगा,

हर लम्हा देते रहे वो मेरा साथ।

शायद यही है प्यार और क्या कहूं?

 

गुलाल मल कर मुस्कुरा देना,

स्पर्श को महसूस कर लाल होना।

चाय की प्याली मुस्कान साथ,

मोहब्बत का कर देना इज़हार।

शायद यही है प्यार और क्या कहूं?

 

सर्दी, गर्मी या हो बरसात,

पल पल में था सदियों का एहसास।

ये तो है इस जनम की बात,

मैं तो चाहूं सातों जनमों का साथ।

शायद यही है प्यार और क्या कहूं?

                     

                        

                         दिनांक- 1.3.2021

 

🌸        🌸

     नाम- अर्चना सिंह जया 
     उम्र -52                        
                            पेशा – अध्यापिका (पद से सेवानिवृत्त)
                     निवासी – गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश