हिन्दी गीत | प्रियंका द्विवेदी की खूबसूरत रचना

हिन्दी गीत

 
   
जमाने से कबके गुजर गए होते , 
जीने से पहले ही मर गए होते! 
मिले  नही   होते   ज़िन्दगी  में आपसे,
तो कबके  मोतियों जैसे टूट के बिखर गए होते ! 
  
 नयनों   के   नीर   से  पीर पवित्र हो जाये,
 स्वाति बूँद चातक के लिए इत्र हो जाये।
 आओ सीख लो प्रेम की परिभाषा प्रिये,
 यह संसार कृष्ण द्रौपदी सा मित्र हो जाये! 
  
 कैसे  कह   दू  के  अपना  बना लो मुझे,
 आकर  के  कही  से चुरा  लो मुझे! 
 बहुत  कठिनाई है जीवन  में प्रिये, 
 सरल रास्ता  तुम  बना  लो मुझे! 
  
 खुसबू  बन सांसो  में  उतर जायेंगे,
 शगुन  बन कर हर जगह छाएंगे।
 महसूस करने की कोशिश कीजिये ,
 हम आपके पास ही नजरआएंगे! 
  
 रूप मेरा   बेकाबू छलक जायेगा,
 श्रृंगार बेकाबू सा बहक जायेगा!
 क्यों  अंधेरे   में  डूबे  हो   प्रिये,
 कभी उँजाला का दीपक जरूर आयेगा! 
  
 मेहंदी और  महावर भी आज उदासे है,
 आँखों के काजल भी अभी प्यासे है! 
 तेरे बिन सब सूना-सूना घर आँगन है, 
 आओ जाओ प्रिय अब तो टूटती सांसे है! 
  
 विगत  वर्षों  से  चल  रहा मन में कुछ उन्माद,
 नही पूरी हो रही मनुष्यता की प्यास। 
 क्या   करूँ  मै   मंथन  इसका,
 जहाँ  बची   ही   नही   कोई आस! 
            
स्वरचित- प्रियंका द्विवेदी 
 मँझनपुर कौशाम्बी 
 
   

पर्यावरण की गुहार | आभा सिंह की खूबसूरत रचना

कविता

पर्यावरण दिवस पर “आभा सिंह” की रचना “पर्यावरण की गुहार” में बहुत ही खूबसूरत तरीके से व्याख्यान किया है, कि प्रकृति मानव से क्या कहना चाहती है? हमे इसे आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर कर रखना है नहीं तो हमारी आने वाली नसलें इस प्रकृतिक सौन्दर्य को नहीं देख पायेंगी।

शीर्षक- पर्यावरण की गुहार

सुरभित -  मुखरित  पर्यावरण की  यही गुहार, 
सुन  लो  मानव  मेरी  पुकार... 
करो  ना  मुझपे  घातक   प्रहार, 
हरे - भरे  पेड़ पौधों  को  नष्ट  करके, 
मत  उजाड़ो मेरा  संसार... 
मैं  पृथ्वी का  जीवन दाता, 
मैं  ही  उसका  भाग्य- विधाता.. 
करने  हैं  मुझे  सब  जीवों  पर  उपकार, 
मत  करो  मेरे  पहाड़ो  पर  विस्फोटक  वार.. 
सुन्दर  सुरभित बाग और  बगीचे मेरे, 
हे  मानव! य़े  सब  काम  आयेंगे  तेरे.. 
मेरी  धरा  पर  पला  बढ़ा  तू, 
फिर  से  कर  ले  तू  विचार... 
कुछ  ना  बचेगा  अगर धरा  का आवरण छूटा,
और  मेरे  सब्र  का  बाँध  टूटा... 
मेरे  साथ  अगर  अन्याय  करोगे,
तो  न्याय  कहाँ  से  पाओगे.. 
सुरभित उपवन व  मुखरित  झरने, 
कहाँ  से  लाओगे.... 
आज़  लेकर  एक  नया  संकल्प,
करेंगे  वसुंधरा का  श्रृंगार..
देकर  नवजीवन  इस  पर्यावरण को,
कर  सकेंगे  सबका  उद्धार...
सुरभित - मुखरित पर्यावरण की  यही  गुहार.. 
सुन  लो  मानव  मेरी  पुकार..!!

स्वरचित-

आभा  सिंह

लखनऊ,उत्तर  प्रदेश

प्रकृति कितनी सुंदर | फूलेन्द्री जोशी की खूबसूरत रचना

पर्यावरण दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं ।🙏🙏🙏। आज की मेरी कविता प्रकृति पर आधारित है। कृपया मुझे शब्दो की गलतियो पर क्षमा कीजिए।

प्रकृति कितनी सुंदर

पर्यावरण दिवस पर “फूलेन्द्री जोशी” की रचना “प्रकृति कितनी सुंदर है” में बहुत ही खूबसूरत तरीके से प्रकृति का व्याख्यान करती है। लेकिन मानव ने किस तरह से इसका सर्वनाश कर दिया है। हमे इसे आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर कर रखना है और उसके लिए भी हमे क्या करना है? कवि फूलेन्द्री जोशी जी ने अपनी इन पंक्तियों मे बताने की कोशिश की है।

प्रकृति की लीला भी न्यारी है। 
जो कितनी सुंदर और प्यारी है। 
कही पहाड़ कही नदियां है। 
कही बर्फ झरने की खूबसुरत वांदियांहै। 
कही विशाल मैदान तो कही सागर है। 
कही सूखा रेत तो कही घने वृक्षो के नागर हैं। 
कही  हवा की शीतलता,तो कही घनघोर बौचार है। 
कही शांत एकांत वातावरण, तो कही वातावरण का कोलाहल है। 
स्वर्ग जैसी लगती है ये  धरती सारी है। 
प्रकृति की लीला भी न्यारी है। 
पर मानव ने प्रकृति को उजाड़ जो दिया है। 
ऐसा लगता है प्रकृति का चिरहरण हुआ है। 
अगर मानव पर्यावरण पर प्रदूषण ना फैलाये, 
सारे मिलकर प्रकृति की सौंदर्यता को बचाये। 
हम मिलकर ये संकल्प करे की पेड़ पौधे खूब लगाये।
प्रकृति के प्रति जो हमारा फर्ज है। हम उसे निभाये। 
तभी तो प्रकृति की रक्षा करने की जिम्मेदारी  हमारी है। 
प्रकृति की लीला भी न्यारी है। 
कितनी सुंदर और प्यारी है।

फूलेन्द्री जोशी तितिरगांव(जगदलपुर)। जिला_बस्तर(छ. ग.)

कभी तुम चुप रहो, कभी मैं चुप रहूँ।

“कभी तुम चुप रहो, कभी मैं चुप रहूँ” मंजू लोढ़ा द्वारा रचित बहुत ही खूबसूरत रचना है। जिसमे उन्होंने प्यार के अहसास को उजागर किया है। जिसमे बातें नहीं सिर्फ एहसास होता है। प्रेम रस से भरपूर ये कविता आपको आपके प्यार की याद जरूर करवाएगी।

कभी तुम चुप रहो, कभी मैं चुप रहूँ।

कभी तुम चुप रहो,
कभी मैं चुप रहूँ,
कभी हम चुप रहें
खामोशियों को करने दो बातें,
यह खामोशियाँ भी बहुत कुछ कह जाती हैं,
जो हम कह न सकें वह भी कह जाती हैं।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें‌।
आओ आज युंही बैठे
एक-दुजे की आंखो में डुबे
उस प्यार को महसुस करे
जो जुंबा पर कभी आया ही नहीं।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें।
आओ हम तुम नदी किनारे
हाथों में हाथ दे चहलकदमी करें
मुद्दतों से जो सोया था एहसास
उसे तपिश की गर्माहट को महसुस करें।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें।
आओ आज छेडे, ऐसा कोई तराना
जो धडकनों में बस जाये
बिन गाये, बिन गुनगुनाये
संगीत की लहरियों में हम डुब जाये। कभी तुम------
चुप रहना कोई सजा नहीं
चुप रहना एक कला है,
जो बिना कहें सब कुछ कह जायें
वह प्यार तो पूजा है।
कभी तुम चुप रहो
कभी मैं चुप रहूँ
कभी हम चुप रहें।
मंजू लोढ़ा ,स्वरचित-मौलिक

मैं एक नारी हूँ। मंजू लोढ़ा द्वारा रचित कविता

“मैं एक नारी हूँ” मंजू लोढ़ा द्वारा रचित बहुत ही अच्छी कविता है। बहुत हुआ हक और सम्मान मांगना अपनी इस कविता मे मंजु जी ने समझ को ये समझाने की कोशिश की है कि अब नारी इस काबिल हो गई है कि वो अपना हक छिन के ले सकती है। नारी की खामोशी को उसकी मजबूरी ना समझा जाए।

मैं एक नारी हूँ।

सदियों से अपनी परंपराओं को निभाया हैं,

उसके बोझ को अकेले ढोया हैं,

इस पुरूषप्रधान समाज ने हरदम

हमको दौयम दर्जे पर रखा है,

अपनी ताकत को हमपर आजमाया है।

पर अब मुझे दुसरा दर्जा पसंद नहीं

मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूँ।

हक और सम्मान के साथ रहना चाहती हूँ।

मेरी सहृदयता को मेरी कमजोरी मत समझो।

मैं परिवार को न संभालती,

बच्चों की परवरिश न करती,

बुर्जुंगो की सेवा न करती,

पति को स्नेही प्रेम न देती,

तो क्या यह समाज जिंदा रहता?

मै कोमल हूँ, पर कमजोर नहीं,

अगर कमजोर होती तो

क्या यह नाजुक कंधे हल चला पाते?

पहाड़ों की उतार- चढा़व पर काम कर पाते?

घर और बाहर की दोनों दुनिया क्या यह संभाल पाते?

मेरे त्याग को तुमने मेरी कमजोरी समझ लिया,

घर-परिवार बचाने की भावना को मेरी मजबुरी समझ लिया।

अगर नारी पुरूष के अहंम को न पोषती,

तो पुरूष आज कहाँ होता?

पुरूष के बाहरी दुनिया के परेशानियों को वह न हरती,

तो पुरुष कहाँ होता?

हमें तो परमात्मा ने अपने गुणों से रंगा है

अपनी भावनाओं से हमें गढ़ा है

इसलिये हम सिर्फ कल्याण करना चाहती है,

इसलिये पुरूष से कई-कई पायदान उंची होकर भी

उनके सामने नतमस्तक हो जाती हैं।

झगडना हमें पसंद नहीं

इसलिये हम सिर्फ स्नेह-ममता-प्रेम

बांटती है-फिर कहुंगी

इसे हमारी कमजोरी मत समझो,

घर की आधारशिला समझो।

मुझे बिल्कुल पसंद नहीं कि

जिस घर को मैनें अपने खून सें सींचा

उसपर मेरा अधिकार ही नहीं

नाम पट्टिका

पर मेरा नाम नहीं।

अब घर हम दोनों का सांझा होगा,

नेम प्लेट पर सिर्फ मेरा ही नाम होगा।

मुझे कतई पसंद नहीं कि

मैं अपनी पसंद का भोजन न करूं

अपनी मर्जी से कहीं आ-जा न पाऊँ।

अब मैं भरपूर ,पल पल जीना चाहती हूँ।

हवाओं में उड़ना चाहती हूँ

सारे बंधन ,सारी पाबन्दियों की

बेडियों को तोड़, मुक्त आकाश में

स्वच्छंद पक्षी की तरह उड़ना चाहती हूँ।

मै सिद्ध कर चुकी हूँ-अपने आप को,

अब कोई अग्निपरीक्षा

नहीं, कोई जंजीरों की बेड़ियां नहीं,

परिवार की जिम्मेदारियों के साथ

खुद के प्रति जिम्मेदारी निभाना चाहती हूँ।

खुद की मनपसंदा बनकर, खुद की पीठ थपथपाकर,

हरदम खुश रहना चाहती हूँ।

मुझे पसंद नहीं सिर्फ

तुम्हारी तकलीफों को सुनुं

सिर्फ तुम्हारे दुःख की भागीदार बनुं,

अब मैं तुम्हारे सुख में सांझेदार होना चाहती हूँ।

घर के सभी मसलों में मेरा भी मत रखना चाहती हूँ।

मुझे तुम अनदेखा अब न कर पाओंगे।

हर कदम पर मेरी उपस्थिती दर्ज रहेंगी।

सोच लो आज से हम,

हर कदम, हमसफर है,

जितना जीने का तुमको हक

उससे कम मुझे स्वीकार नहीं।

युद्ध क्षेत्र से लेकर

आसमानी यात्रा में

हमने अपना परचम फहराया है।

अपनी बुद्धीमत्ता का लोहा मनवाया है।

दुनिया को दिखलाया है

किसी से हमारा कोई मुकाबला नहीं

क्योंकि हम किसी से कम नहीं।  

 

मंजू लोढ़ा द्वारा रचित

हिन्दी कविता और हिन्दी साहित्य