पिता दिवस पर विशेष By Pratishtha Sharma

“पिता दिवस पर विशेष” कविता प्रस्तुत कर रही है “प्रतिष्ठा शर्मा” जी। पिता की भूमिका को क्या बखूबी वर्णित किया है।

पिता दिवस पर विशेष

जीवन की टेढ़ी – मेढ़ी पगडंडियों पर,

 जिसने चलना सिखाया है।

 काँटों पर खुद चलकर,

हर चुभन से मुझे बचाया है।

जिनके स्पर्श से सदैव,

एक सुकूं-सा दिल को होता है।

वो तब – तब मेरे समीप होते हैं,

जब – जब ये दिल रोता है।

जिनकी स्मृति अधरों पर,

अश्रुपूर्ण मुस्कान ला देती है।

एक ठंडी श्वास.. एक आस,

एक विश्वास जगा देती है।

हर रिश्ते से परे ये अह्सास करा देती है।

कि.. तू आज भी अपने पिता की ही बेटी है,

आज जो कुछ भी जीवन में पाया है,

वो सब उन्हीं का सिखाया है।

वो सशरीर भले ही साथ न हों,

लेकिन मुझपर..सदैव उनका साया है।

सब कुछ होते हुए भी हृदय में,

एक रिक्तता का अह्सास होता है।  

और कभी – कभी ‘ ये ‘ आभास होता है।

कि काश! काश,

अपने जीवन की माला में कुछ..

और मोती पिरोती कुछ…

और बचपन होता कुछ

और.. खुशियाँ होतीं

 ग़र आज ‘ वो ‘ साथ होते

तो.. कुछ और बात होती ।