शहीद दिवस 23 मार्च

तीन नायक, जिन्होंने हमारे देश को स्वतंत्रता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उन तीन महान क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि देते हुए शहीद दिवस मनाया जाता है।

भारत में शहीद दिवस मुख्य रूप से वर्ष में दो बार मनाया जाता है। वास्तव में हम 5 शहीद दिवस मनाते हैं। आज हम 23 मार्च के बारे में बात करने जा रहे हैं।

23 मार्च

23 मार्च को उस दिन के रूप में याद किया जाता है, जब भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर तीन बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इस दिन हम उन्हे याद करते है। जिन्होंने हमारे लिए और हमारी स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया।

तीन नायक, जिन्होंने हमारे देश को स्वतंत्रता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उन तीन महान क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि देते हुए शहीद दिवस मनाया जाता है।

फांसी की बजह

1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या करने के लिए उन्हें फांसी दि गयी थी। जिन्हे जेम्स स्कॉट  समझ कर की गलती से मार दिया गया। जेम्स स्कॉट को इसलिए मारना था, क्योंकि वह स्कॉट ही था। जिसने लाठीचार्ज का आदेश दिया था। जिसके कारण लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी। ये तीनों उन अमर शहीदों में से थे जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और वो भी तब, जब वे बहुत छोटे थे। वे अनगिनत युवाओं को प्रेरित करते हैं। उनकी मृत्यु ने  एक मिसाल कायम की। ऐसा करने के लिए, उन्होंने आजादी के लिए अपना रास्ता खुद बनाया था।  जिस रास्ते पर व्यक्तिगत वीरता और राष्ट्र के लिए कुछ करने के जज्बे की बहुत ज्यादा जरूरत थी।

इसमें कोई संदेह नहीं है, उन्होंने हमारे राष्ट्र के कल्याण के लिए अपने जीवन का बलिदान किया है।  चाहे उन्होंने महात्मा गांधी से अलग रास्ता चुना हो। वे भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। इतनी कम उम्र में, वे आगे आए और स्वतंत्रता के लिए उन्होंने बहादुरी के साथ संघर्ष किया।

उन्हे कैसे गिरफ्तार किया?

भगत सिंह ने गिरफ्तारी लाहौर जनरल असेंबली में बम्ब फ़ैकने पर दी थी। लेकिन जॉन सॉन्डर्स मामले के साथ उनके संबंध को भी प्रकाश में लाया गया।

सुखदेव को पुलिस द्वारा लाहौर और सहारनपुर में बम फैक्ट्री स्थित करने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया।

हालांकि सुखदेव और भगत सिंह को अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया था।  लेकिन पुलिस ने कई बिंदुओं को जोड़ा और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सॉन्डर्स की हत्या के लिए आरोपित किया और उन्हें मौत की सजा सुनाई। इस मामले को बाद से ये केस “लाहौर षड्यंत्र” केस के नाम से जाना गया।

23 मार्च को फांसी

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च को फांसी दी जाने वाली थी, लेकिन एक दिन पहले 23 मार्च को शाम 7:30 बजे उन्हें फांसी दे दी गई।

हर साल हम शहीद हुए स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं और उनके लिए अपना सम्मान और आभार व्यक्त करते हैं।  हम उन वीरों के साहस और उनके दृढ़ संकल्प को याद करते हैं और उन्हे बारम्बार प्रणाम करते है।

अन्य शहीद दिवस

30 जनवरी: जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। उन्हे 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी थी।

13 जुलाई: जम्मू-कश्मीर में 22 लोगों की मौत को याद करने के लिए इसे शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। 13 जुलाई, 1931 को, कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के निकट प्रदर्शन करते हुए शाही सैनिकों द्वारा लोगों की हत्या कर दी गई थी।

17 नवंबर: इस दिन को ओडिशा में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिसे लाला लाजपत राय की पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने ब्रिटिश प्रभुत्व से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

19 नवंबर: इस दिन को झांसी में शहीद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। 19 नवंबर को रानी लक्ष्मी बाई का जन्म हुआ था। जिन्होंने 1857 के विद्रोह के दौरान अपने जीवन का बलिदान भी दिया था।

 

शहीद दिवस पर कविता और शायरी

एक दम ना कहना घर वालों से,

उलझाये रखना उनको सवालों से।

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आज मेरी लेखनी अदब से स्वयम् झुक गई,

कुछ लिखने से पहले कलप गई,

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देश के वीरों तुझको

करती हूँ हाथ जोड़ नमन

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हंसते-हंसते देश हित हो गए जो कुर्बान

सुखदेव-भगतसिंह-राजगुरु को शत् शत् प्रणाम।

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शहादत की लिखी अजब कहानी थी,

 मर मिटने को आतुर गजब जवानी थी।

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मै सबसे बेहतर हूँ।

अगर आप सचमुच जिंदगी मे कामयाब होना चाहते है तो हर सुबह उठ कर अपने आप से ये 5 वाक्य जरूर कहें।

आज मेरा दिन है।

जब भी नींद से उठें तो आने वाले 24 घंटों को एक अवसर के रूप में देखें। ये जो अवसर आज आपको मिला है। हर किसी को नहीं मिलता है। बहुतों को मिलता है लेकिन इसका लाभ कोई-कोई ही उठा पाता है। जिंदगी में वो ही ज्यादा संतुष्ट है।

जो आज का लाभ आज ही उठा लेता है जिसके लिए हर दिन एक अवसर है। आज ही जागिए और शुरू हो जाईए आज आपका दिन है।

मै सबसे बेहतर हूँ।

कभी भी अपने आप की तुलना किसी दूसरे के साथ ना करें। तुम सिर्फ तुम हो, तुम कोई ओर नहीं हो सकते हो। प्रकृति ने तुम्हें उसकी जरूरत के हिसाब से तैयार किया है। तुम सुभाष चंद्र बोस नहीं हो सकते हो, ना ही तुम अक्षय कुमार हो सकते हो। तुम वो ही हो  जो तुम हो। हाँ तुम बेहतर बन सकते हो। तुम सुभाष चंद्र बोस से कुछ सिख सखते हो। तुम किसी से भी, कुछ भी सीख सकते हो।

प्रकृति ने तुम्हें जिस काम के लिए, जिस मकसद से बनाया है वो तुम्हें ही करना है उसे तुम से बेहतर कोई ओर नहीं कर सकता। अगर कोई ओर कर सकता तो तुम्हें नहीं बनाया जाता। इसलिए तुम सिर्फ तुम हो और बेहतर हो। इस जिम्मेदारी के लिए जब भी नींद से जागो, खुद को बेहतर महसूस करो ओर अपने कर्तव्य पथ पे आगे बड़ जाओ। 

मै ये कर सकता हूँ।

तुम जो भी सोचते हो चाहे सकारात्मक या नकारात्मक तुम सही होते हो। अगर तुम सोच लेते हो की ये काम आसान है तुम कर लोगे तो तुम सही सोच रहे हो तुम कर लोगे। अगर तुम सोच रहे हो की नहीं ये मुश्किल काम है तुम से नहीं होगा तुम तब भी सही सोच रहे हो, तुम से नहीं होगा। सारा खेल हमारी सोच का है। इंसान की सोच ताकतवर होनी चाहिए शरीर तो बस दिखावा है।

सुबह उठ कर उन सब कामों की सूची बनाएं जो आज के मुश्किल काम है। उनको समझे और अपने आप को तैयार करें उन्हे करने के लिए। अपने आप से बोलें की में ये कर सकता हूँ। याद रखना इंसान सिर्फ वो ही काम शिद्दत से करता है जिसको करने का वादा वो अपने आप से करता है।

भगवान हमेशा मेरे साथ हैं।

भगवान को किसी ने नहीं देखा है लेकिन विश्वास होना चाहिए। भगवान क्या इंसान भी आपका साथ तब ही देगा जब आप उस इंसान पे भरोसा रखोगे। तुम भी कोई काम तब ही कर पाओगे, जब तुम्हें खुद पे भरोसा होगा। तो वेसे ही भगवान पे भी भरोसा रखो की वो तुम्हारे साथ है।

तुम कोई भी काम कर रहे हो कोई और तुम्हारी सहायता करे ना करे, भगवान तुम्हारी सहायता जरूर करेंगे। बस ये विश्वास होना चाहिए कि वो तुम्हारे साथ है। तब ही तुम खुद का साथ दे पाओगे।

मैं विजेता हूँ।

किसी को हराकर कोई नहीं जीतता है। जीतता वही है जो सीखता है। आप किसी परीक्षा में असफल हो जाते हो तो कोई बात नहीं, अगर आप ने कुछ भी नया सिखा है तो आप विजेता हो। जैसे ही आप सीखना बंद करते हो तो उस वक्त से आप विजेता नहीं रहते हो। बूँद – बूँद से घड़ा भरता है और बूँद – बूँद टपकने से खाली हो जाता है। हमेशा कुछ ना कुछ सीखते रहें और अगर आज कुछ भी नया सिखा है तो खुद को विजेता समझें।

दोस्तों attitude बदलने से इंसान की जिंदगी अक्सर बदल जाया करती है। इसलिए अपने दिन की शुरुआत इन 5 वाक्यों से करें।

नेताजी, Mystery और History

आज हम आपको एक ऐसे इंसान की कहानी बताने जा रहे है। जिस इंसान ने देश के लिए बहुत कुछ किया है। अपनी पूरी की पूरी जिंदगी जिसने देश के नाम कर दी। जिसने जब से होश संभाला सिर्फ देश के बारे मे सोचा। उस इंसान ने इतना कुछ किया है देश के लिए लेकिन आपको उसके बारें मे ज्यादा कुछ पता नहीं है। आपको गांधी जी के बारे मे सब पता होगा नेहरू ने क्या किया आपको पता होगा, लेकिन सुभाष चंद्र बॉस की कोई बात नहीं करता है। हाँ अब पिछले कुछ सालों से उनके बारे मे बातें होनी शुरू हुई है कुछ web series भी बनने लगी है। तो आज हम उसी महान हस्ती की बात करने जा रहे।

शुरुआती जीवन।

इनका जन्म हुआ था 23 जनवरी 1897 को कटक मे। ये बचपन से ही बहुत मैदावी थे। अच्छे परिवार से भी थे। बॉस जी विवेकानंद को बहुत मानते थे। उनसे ही प्रभावित हो कर हो कर उन्होंने ये सोच लिया था, कि मुझे देश के लिए कुछ अच्छा, कुछ बड़ा करना है। वो बुराई के आगे हमेशा खड़े रहते थे।

एक बार बॉस जी कक्षा मे बैठे थे तभी एक अंग्रेज अध्यापक ने हिंदोस्तान के विरुद्ध कुछ उपशब्द बोल दिए। जिसके कारण बोस जी की उस अध्यापक से लड़ाई हो जाती है और इन्हे कॉलेज से निकाल दिया जाता है।

सिवल सर्विसेज़ से इस्तीफा।

इनके पिता जी चाहते थे कि सुभाष नौकरी करे। जिसके लिए इन्हे लंदन भेज दिया जाता है civil service के पेपर की तैयारी करने के लिए। बोस जी ने पेपर दिया और पूरे भारत मे चौथे स्थान पर रहे। लेकिन फिर भी उन्होंने civil services को छोड़ दिया क्योंकि उनको लगा कि मै सिवल सर्वेन्ट बन कर भी अंग्रेजों का गुलाम हूँ। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और आ गए देश की सेवा मे।

आजादी की लड़ाई मे सुभाष चंद्र बॉस का योगदान।

स्वराज अखबार ।

1921 मे बॉस जी ने “स्वराज” नामक अखबार लिखना शुरू किया। अपने अखबार के माध्यम से लोगों को आजादी के लिए जागृत करना शुरू किया। लोग इनसे बहुत प्रभावित होने लगे। इनको नेता जी के नाम से जाना जाने लगा।

कांग्रेस मे शामिल।

वो लोगों मे इतने प्रचलित हो गए कि, 1923 मे इन्हे भारतीय youth congress का president घोषित कर दिया सिर्फ दो ही साल मै। इनकी सोच ने, लोगों मे भी आजादी का जोश और जज़्वा भर दिया। अब अंग्रेजों को भी इनसे डर लगने लगा था। बोस जी को जेल मे डाल दिया। फिर कुछ समय बाद बॉस जी बाहर आ गए तथा 1927 मे इनको कॉंग्रेस का general secretary बना दिया गया।   

नेता जी और नेहरू मे दोस्ती

धीरे धीरे नेहरू और सुभाष मे दोस्ती हो गई क्योंकि दोनों को पूर्ण स्वराज चाहिए था। जब इनके सुर कांग्रेस से नहीं मिले तो दोनों ने अपनी अलग पार्टी बना ली Indian independent league, फिर गांधी जी ने समझा बुजा के इनको कांग्रेस मे ही रखा।

The Indian Struggle किताब।

1930 मे सुभाष जी यूरोप जाते है और वहाँ कई लोगों से मिले और फिर एक किताब लिखी the Indian struggle, उसमे उन्होंने अंग्रेजों के बारे मे लिखा था। कैसे वो इंसानियत पे अत्याचार करते थे। इस किताब पर लंदन मे रोक लगा दी गई थी। लेकिन सुभाष जी लोगों मे और प्रचलित होते गए, लोग इनको बहुत मानते थे।

नेताजी और गांधी जी की अलग अलग विचारधारा।

एक बात ध्यान रखना, जब कोई बड़ी जल्दी आगे बड़ता है तो साथ वालों को रास नहीं आता है। 1938 तक सुभास चंद्र बॉस इतने प्रचलित हो गए थे कि हरीपुरा अधिवेशन मे सुभाष जी को कॉंग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेस का एक खेमा तो इनके पक्ष मे था, लेकिन इनके विरुद्ध मे थे । महात्मा गांधी और कांग्रेस के कुछ लोग जिन्हे बॉस जी की ideology समझ मे नहीं आती थी। हाँ ये बात भी है कि सुभाष चंद्र बॉस गांधी जी कि बहुत इज्जत करते थे।

नेताजी का कांग्रेस से इस्तीफा।  

1939 मे बॉस जी फिर से चुनाव मे खड़े हो जाते है। लेकिन गांधी जी उनके विरुद्ध अपना एक आदमी खड़ा कर देते है, और उसे पूरा सहयोग भी देते है लेकिन बॉस जी चुनाव जीत जाते है और दोबारा अध्यक्ष चुन लिए जाते है। इससे गांधी जी नाराज हो जाते है। कांग्रेस दो खेमे मे बँट जाती है क्योंकि गांधी जी को नेताजी की विचारधारा विलकुल भी पसंद नहीं थी। ये बात जब सुभाष जी को पता चली तो उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। वो नहीं चाहते थे की भारतीय आपस मे लड़ाई करें। इसके बाद 1940 मे उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी बनाई forward bloc,  

हिटलर से मुलाकात

1941 मे ये जर्मनी चले जाते है और हिटलर से जा कर मिलते है। वो चीजों को देखते है उन्हे समझते है। उनके व्यक्तित्व मे जादू था जिससे हिटलर भी प्रभावित था। नेताजी ने वहीं से ये आजादी की लड़ाई को नये सिरे से लड़ते है।

आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व।

रास बिहारी बॉस की सहायता से 1943 मे ये सिंगापूर पहुँच जाते है। वहाँ जाकर निरक्षण करते है आजाद हिन्द फौज का। फिर बॉस जी ही आजाद हिन्द फौज की कमान संभालते है और अंग्रेजों के  दांतों तले चने चवा देते है। उन्होंने नारा दे दिया “तुम मुझे खून दो मे तुम्हें आजादी दूंगा”।

सेना की टुकड़ियों को नाम दिए रानी झांसी रेजीमेंट, गांधी रेजीमेंट, नेहरू रेजीमेंट इससे ही पता चलता है कि वो भारत से कितना प्यार करते थे। उनका निजी कुछ नहीं था। वो जो भी कर रहे थे सब देश के लिए कर रहे थे। उनका आजादी पाने का रास्ता गांधी जी से अलग था लेकिन उनके प्रति बॉस जी के मन मे कोई द्वेष नहीं था।

1943 मे ही बॉस जी स्थापना करते है आजाद हिन्द सरकार की जिसके मुख्य कार्यालय थे सिंगापूर और रंगून मै।

दूसरा विश्वयुद्ध और जापान की हार।

इस समय ही पूरे विश्व मे दूसरा विश्व युद्ध चल रहा होता है। इंग्लैंड को उसके सहयोगी देशों का साथ मिल जाता है। जिससे जापान कमजोर पड़ जाता है।  परिणाम स्वरूप आजाद हिन्द फौज भी अंग्रेजों से हार जाती है।

इसी बीच मे सुभाष चंद्र बॉस जी घूम हो जाते है। इसके पीछे कई कहानियाँ है। अलग अलग लोगों की अलग राय है। लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है की सुभाष जी कहाँ गए उनके साथ क्या हुआ।

हम इतना आवश्य जानते है कि वो भारत माँ का एक ऐसा शेर था। जिसने अकेले ही अंग्रेजों की नाक मे धम कर रखा था। वो निस्वार्थ देश सेवा मे लगे रहे। ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि, भारत माँ के इस वीर को जो सम्मान मिलना चाहिए था। वो मिला नहीं। नोट पर फोटो के और भारत रत्न के ये सबसे बड़े अधिकारी थे। लेकिन वो हमारे दिलों मे जिंदा है और हमेशा रहेंगे।

World Games Athlete of the Year और देश में सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी, रानी रामपाल

क्या आप जानते है? 2020 मै Athlete of the Year का Award किस खिलाड़ी को दिया गया? दोस्तों ये विश्व स्तरीय इनाम भारत की महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल को दिया गया है।

मै आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, की वो दुनिया की पहली ऐसी हॉकी खिलाड़ी है जिन्हे ये विश्व स्तरीय इनाम दिया गया है। इसके अलावा हाल ही मे भारत सरकार ने भी उन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया है। वो हरियाणा से हैं और सिर्फ 15 साल की उम्र मे ही उन्हे भारतीय हॉकी टीम के लिए चुन लिया गया था।

आईये जानते है, रानी रामपाल के बारे मे विस्तार से। 

देश में सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी और हमारी राष्ट्रीय टीम की सक्षम कप्तान, रानी रामपाल की यात्रा वास्तव में सभी पुरुषों और महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है।

बचपन

 उनका जन्म 4 दिसंबर 1994 को हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में हुआ था। 6 साल की उम्र में ही वो शहर की हॉकी टीम में शामिल हो गईं थी।

शाहबाद हॉकी अकादमी

 2003 में, उन्होंने शाहबाद हॉकी अकादमी में प्रशिक्षण शुरू किया। यहां, वह उस आदमी से मिली, जिसने उसकी जिंदगी बदल दी। द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच बलदेव सिंह, ने रानी को प्रशिक्षण दिया।

रानी जी कहती है कि, वह हमेशा शाहबाद अकादमी की ऋणी रहेंगी, क्योंकि शाहबाद अकादमी ने ही उन्हे एक विश्व स्तर का खिलाड़ी बनाया है। ये हमेशा मेरे लिए विशेष रहेगी। मैंने उस अकादमी में हॉकी के बारे में सबकुछ सीखा। अकादमी ने कई अंतरराष्ट्रीय खिलाडी दिए है और यह देश की सबसे पुरानी हॉकी अकादमियों में से एक है।

हॉकी का सफर

वर्ष 2009 में, रानी ने रूस में चैंपियन के चैलेंज टूर्नामेंट में भाग लिया। वह शीर्ष स्कोरर थीं, साथ ही यंग प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट अवार्ड विजेता भी थीं।

2010 विश्व कप टूर्नामेंट में रानी ने सर्वश्रेष्ठ युवा खिलाड़ी का पुरस्कार जीता। वह तब सिर्फ 15 वर्ष की थी और विश्व कप में भाग लेने वाली राष्ट्रीय टीम में सबसे कम उम्र की खिलाड़ी बनी। उसने टूर्नामेंट में 7 गोल किए।

2013 के जूनियर विश्व कप में भी, रानी को प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट के रूप में घोषित किया गया था।

वर्ष 2018, रानी के लिए वास्तव में विशेष था, क्योंकि टीम ने एशियाई खेलों में रजत जीता था।

रानी रामपाल निस्संदेह देश की सर्वश्रेष्ठ महिला हॉकी खिलाड़ी हैं और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं।

रानी रामपाल इंडोनेशिया के जकार्ता में 2018 एशियाई खेलों के समापन समारोह में भारतीय दल की ध्वजवाहक थीं।

पुरस्कार

  • अर्जुन पुरस्कार, 2016
  • FIH यंग प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट, 2010
  • फिक्की कमबैक ऑफ द ईयर, 2014
  • 2020 में हॉकी खिलाड़ी रानी रामपाल ने इतिहास रचा, जब उन्हें वर्ल्ड गेम्स एथलीट ऑफ द ईयर 2019 ’चुना गया। भारतीय महिला टीम की कप्तान विश्व की पहली हॉकी खिलाड़ी हैं जिन्हें सम्मान के साथ सम्मानित किया गया है।
  • 2020 में, भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।

एफआईएच और वैश्विक हॉकी समुदाय की ओर से,  हमारी टीम  रानी को वर्ष 2019 के विश्व खेल एथलीट के रूप में चुने जाने के लिए हार्दिक बधाई देते हैं। यह उनके उत्कृष्ट प्रदर्शनों की स्वीकारोक्ति है

देश भक्ति शायरी।

देशभक्ति शायरी

देशभक्ति या राष्ट्रीय गौरव प्रेम, भक्ति की भावना और मातृभूमि के प्रति लगाव की भावना और अन्य नागरिकों के साथ जोड़ता है जो समान भावना साझा करते हैं। यह लगाव जातीय, सांस्कृतिक, राजनीतिक या ऐतिहासिक पहलुओं सहित, अपनी मातृभूमि से संबंधित कई अलग-अलग भावनाओं का संयोजन हो सकता है।

देश प्रेम  की इन कविताओं से आपका रोम रोम खिल उठेगा।

देशभक्ति शायरी और कविताएं अब हिंदी में भी उपलब्ध है आप सब के लिए वो भी सबसे अच्छी और नई।

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हैलो और hi सुनकर तो नहीं आती।

मगर जब कोई कहता है, जय हिन्द ।

ए हिन्द तेरी याद आती है।। 

की लौह दंड धन पे पटकते है एक बार । 

छोटी-छोटी मार बार-बार करते नहीं।

वीरता के तक्ष पक्ष तोपों के समक्ष दर ,

पीठ पीछे छुप के प्रहार करते नहीं । 

युद्ध लड़ते है, पूरी वीरता के साथ वीर । 

इंसानियत शर्मशार करते नहीं । 

वंशा जहे वीरों के दहाड़ते है कालजे से । 

पड़ी हुई लाश का शिकार करते नहीं।। 

तुम्हारे दिल मे रहता है जो, वो ही अरमान दिल मे है। 

मेरा मजहब कोई भी हो, दिल मे इंसान जींद है । 

अमीरी यह अदा की है , कलम दे कर मुझे रब ने। 

महोवब्त शायरी मे और हिंदोस्तान दिल मे है।। 

इन्ही के शोर्य से माँ भारती का मान जिंदा है। 

वतन की आन जिंदा है, वतन की शान जिंदा है। 

लगा कर जान की बाजी , खड़े जवान सरहद पर। 

इन्ही रणवांकुरों के धम पे हिंदोस्तान जिंदा है।।  

क्योंकि जिस वक्त जीना गैर मुमकिन सा लगे। 

उस वक्त जीना फर्ज है इंसान का । 

और है जरूरी लहरों के संग खेलना तब । 

जब हो समुन्द्र पर नशा तूफान का ।। 

प्राण दे दिए जिन्होंने, भारती की आरती मे। 

क्रांति आग्नि धधकाने वालों को ना भूलना ।

लडलों ने वक्त पर रक्त की आहुतियाँ दी ।

राष्ट्र धर्म यूं , निभाने वालों को न भूलना । 

फाँसिओं के फंदों पर गान बंदे मातरम,

बार-बार दोहराने वालों को न भूलना।

उत्सवों महोत्सवों को मनाएं किन्तु। 

छातियों पे गोली खाने वालों को न भूलना।। 

क्या आप जानते है? Great Indian Mathematician रामानुजन के बारे में।

क्या आप जानते है कि श्री रामानुजन कौन थे? अब आप कहेंगे कि वो एक बड़े गणितज्ञ थे। लेकिन कितने बड़े? क्यों लोग उन्हे प्रतिभावान बोलते थे? क्यों उनकी तुलना न्यूटन से कि जाती है?

बचपन

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर, 1887 को भारत के दक्षिण पूर्व में तमिलनाडु के इरोड शहर में हुआ था। उनके पिता केo श्रीनिवास अयंगर थे, जो एक साड़ी की दुकान पे क्लर्क का काम करते थे। उनकी मां एक गृहणी थी।

रामानुज बचपन से ही बड़े जिद्धी थे। अगर उन्हे अपनी पसंद का खाना नहीं मिलता था तो वो मिट्टी में लेट जाते थे। जब तक उनकी बात नहीं मानी जाती थी। इसके साथ साथ वो बहुत जिज्ञासु भी थे। उनके मन में क्यों सवाल आते रहते थे जैसे की दुनिया का पहला आदमी कौन था। जहां से बादल कितनी दूर है इत्यादि।


स्कूल के दिनों में

एक बार क्लास में एक अध्यापक ने कहा जब भी आप एक अंक को उसी से भाग दें उसका उतर एक आता है जैसे कि आप 1000 फलों को 1000 लोगों में बांट दो तो सबको एक ही मिलेगा। तब रामानुज एकदम से बोल पड़े लेकिन ये ज़ीरो के लिए सही नहीं है क्योंकि अगर हम ज़ीरो को ज़ीरो से भाग करते है तो उत्तर एक नहीं होगा। मतलब कि किसी को एक भी फल नहीं मिलेगा।

उनके परिवार के पास ज्यादा पैसे नहीं थे इसलिए उन्होंने दो विद्यार्थियों को कमरा किराए पे दे दिया। जो कि कॉलेज में पढ़ते थे। उन्होंने देखा की रामानुजन बहुत होनहार है इसलिए ये रामानुजन को गणित पड़ाते थे। और देखते ही देखते रामानुजन गणित में उनसे ज्यादा होशियार हो गए।

स्कूल में उनकी प्रतिभा से हर कोई वाकिब था। गणित के अध्यापक बोलते थे कि ये गणित में इतने होशियार है कि में इन्हे 100 से भी ज्यादा नंबर देना चाहता हूं।


कॉलेज के दिन

कॉलेज के दिनों में जिन सवालों को अध्यापक 9 या 10 चरणों में पूरा करते रामानुजन उनको 3 या 4 चरणों में ही ख़तम कर देते। 3 घंटे के पेपर को वो 1 घंटे में ख़तम कर देते थे। लेकिन उनको कॉलेज छोड़ना पड़ा। क्योंकि वो बाकी विषयों में फैल हो गए थे।

शादी और करियर

छोटी उम्र में ही उनकी शादी जानकी देवी से करवा दी गई। उस समय छोटी उम्र में शादी होना आम बात थी।
अब उनको लगा कि उन्हे पैसे कमाने पड़ेंगे तो वो नौकरी ढूंड्डने लगे। और मद्रास port of trust में उन्हे नौकरी मिल गई। वो सर फ्रांसे और नारायण अय्यर के कार्यालय में काम करने लग पड़े। उन्हे 30 रुपए महीना मिलता था।


हार्डी को पत्र

सर फ्रांस के मालूम था कि ये लड़का गणित में बहुत अव्वल है। तो वो उसकी मदद करते है। उन्होंने रामानुजन को प्रेरित किया कि वो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर को पत्र लिखे और आपका काम उन्हे दिखाए।

उन्होंने ऐसा किया और एक प्रोफ़ेसर को उनका काम पसंद आ भी गया। इस प्रोफ़ेसर का नाम था J H Hardy, उनका लिखा हुआ पत्र बहुत ही दिलचस्प था इसलिए कई विश्वविद्यालयों में ये पत्र दिखाया भी जाता है। जो ऐसे लिखा था।


डियर सर
मै एक अकाउंट क्लर्क हूं इंडिया में,और मेरी एक साल की तनख्वाह 20 पाउंड है, मै 23 साल का हूं मेरे पास कोई विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं है। मेरे पास बस स्कूल के सर्टिफिकेट है। मेरे पास जो भी फ्री समय होता है उसे में गणित में लगा देता हूं। जहां के गणितज्ञ मेरे काम को अव्वल दर्जे का मानते है। मै आपको अपनी कुछ theorms भेज रहा हूं अगर आपको कुछ इसमें अच्छा लगता है तो मै चाहता हूं कि मेरे इस काम को प्रकाशित किया जाए।
yours truly
S Ramanujan

उस समय hardy को बहुत सारे पत्र मिलते थे। जो दावा करते थे अलग अलग theorms को साबित करने का। लेकिन hardy बोलते हैं कि “मैंने पहले कभी भी उनके जैसा कुछ नहीं देखा था। उनको एक बार देखने पर ही ये पता चल जाता था कि वे केवल उच्चतम श्रेणी के गणितज्ञ द्वारा लिखे जा सकते थे। उन्हें सच होना चाहिए, क्योंकि अगर वे सच नहीं होते, तो किसी को भी उन्हें आविष्कार करने की कल्पना नहीं की होती। ”

इसके बाद Hardy ने रामानुज को पत्र लिखा

डियर सर
मै आपके काम में intrested हूं। आप जितनी जल्दी हो सके इनके प्रूफ मुझे भेज दें।

Hardy के इस पत्र के बाद ब्रिटिश सरकार भी रामानुज को गम्भीरता से लेने लग गई।
उनके पास कोई कॉलेज की डिग्री नहीं थी इसके बाबजूद उन्हे प्रेसीडेंसी कॉलेज में अनुसंधान छात्रवृति मिल गई। उन्हे 75 रुपए महीने के हिसाब से मिलते थे। Hardy को बहुत कोशिश करने पर रामानुज कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जाने के लिए राजी हुए।


रामानुजन का कैम्ब्रिज आना

1914 में रामानुज कैम्ब्रिज आए और hardy से मिले और उन्हे अपनी बहुत सारी theorms बताई जो उन्होंने हल को थी। hardy ने उन्हे प्रेरित किया, कि अगर वो अपने काम को प्रकाशित करना चाहते है तो उन्हे सबके proove देने होंगे। जिसके लिए रामानुजन ने classes लेना शुरू किया और 1915 तक रामानुज के 09 पेपर प्रकाशित हो चुके थे।


रॉयल सोसाइटी का फेलोशिप मिलना।

इंग्लैंड में रामानुजन एक गणितज्ञ के रूप में बहुत पहचान बना चुके थे, और उन्हे वो पहचान मिल गई थी जिसकी उन्हें उम्मीद थी। कैम्ब्रिज ने उन्हें 1916 में ” स्नातक” की उपाधि प्रदान की, और उन्हें 1918 में रॉयल सोसाइटी का फेलो (पहले भारतीय होने के लिए सम्मानित किया गया) चुना गया।


स्वास्थ्य का बिगड़ना।

इस समय पहला विश्व युद्ध भी चल रहा था और रामानुज को अपनी पत्नी और मां की याद आती है। वो चाहते थे कि उनकी पत्नी उनके साथ कैम्ब्रिज आ जाए। लेकिन उनकी मां ऐसा नहीं चाहती थी, इसलिए वो रामानुजन के पत्र जानकी को नहीं दिखती थी। और जानकी के पत्र भी रामानुजन तक नहीं पहुंचने देती थी।

रामानुजन बहुत दुखी हो गए थे क्योंकि उन्हे अपने पत्र का कोई जवाब नहीं मिल रहा था। वो बीमार भी रहने लगे और चेकअप के बाद पता चला कि उन्हे ट्यूबरक्लोसिस है।


बापिस भारत लौटना और निधन।

फिर वो बापिस भारत आ गए। लेकिन उनका स्वास्थ्य और ज्यादा खराब हो गया और 32 वर्ष की आयु में 1920 में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद तीन पुस्तिकाएं और कागजों की एक शीफ (“खोई हुई नोटबुक”) मिली। इन नोटबुक्स में हजारों परिणाम थे। जिनको आज भी कोई हल नहीं कर पाया है। जो अभी भी दशकों बाद गणितीय कार्य को प्रेरित कर रहे हैं।

महान हस्थियों के विचार

प्रोफेसर ब्रूस बर्नड एक विश्लेषणात्मक संख्या सिद्धांतकार हैं, जिन्होंने 1977 से, रामानुजन के प्रमेयों पर शोध करने में दशकों बिताए हैं। उन्होंने उनके बारे में कई किताबें प्रकाशित की हैं। महान हंगेरियन गणितज्ञ पॉल एर्दो एक दिलचस्प बात बताते हैं कि, जीo एचo हार्डी ने एक बार उनसे कहा था:

पौल एर्दो “मान लीजिए कि हम गणितज्ञों को शुद्ध प्रतिभा के आधार पर 0 से 100 के पैमाने पर रेट करते हैं। तो हार्डी ने खुद को 25, लिटलवुड को 30, हिल्बर्ट को 80 और रामानुजन को 100 का स्कोर दिया था।”


राष्ट्रीय गणित दिवस

भारत सरकार ने 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस घोषित किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 26 फरवरी 2012 को मद्रास विश्वविद्यालय में भारतीय गणितीय प्रतिभा श्रीनिवास रामानुजन के जन्म की 125 वीं वर्षगांठ के समारोह के उद्घाटन समारोह के दौरान इसकी घोषणा की।

राष्ट्रीय गणित दिवस कैसे मनाया जाता है?

भारत में विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रीय गणित दिवस मनाया जाता है। यहां तक कि इंटरनेशनल सोसायटी यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) और भारत सरकार ने गणित सीखने और समझने के लिए एक साथ काम करने पर सहमति व्यक्त की थी।

इसके साथ ही, छात्रों को गणित में शिक्षित करने और दुनिया भर में छात्रों और शिक्षार्थियों के लिए ज्ञान फैलाने के लिए विभिन्न कदम उठाए गए।

NASI (द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस इंडिया) इलाहाबाद में स्थित सबसे पुराना विज्ञान अकादमी है जो राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने के लिए, NASI गणित और रामानुजन के अनुप्रयोगों में एक कार्यशाला आयोजित करता है।

कार्यशाला में राष्ट्र भर से गणित के क्षेत्र में लोकप्रिय व्याख्याताओं और विशेषज्ञों द्वारा भाग लिया जाता है। देश और दुनिया के स्तर पर वक्ता श्रीनिवास रामानुजन के गणित में योगदान पर चर्चा करते है।

क्या कमला हैरिस सच में भारतीय मूल की हैं??

अमेरिकन राष्ट्रपति चुनाव 2020 खत्म हो चुके है। डेमोक्रेट्स पार्टी के Mr. Joe Biden  अमेरिका के 46वे राष्ट्रपति होंगे। लेकिन इसी के साथ में  एक और बेहतरीन खबर ये है कि डेमोक्रेट्स पार्टी की ही उपराष्ट्रपति पद की दावेदार Miss Kamala Harris भी जीत गई है। वो पहली भारतीय मूल की महिला है जो अमेरिका में उपराष्ट्रपति बनी है। ये ना सिर्फ भारतीयों के लिए बल्कि दुनिया भर की महिलाओं के लिए गौरव की बात है।

तो हम इस ब्लॉग हम आपको बताएंगे कि क्या वो सच मे भारतीय मूल की हैं? उन्होंने क्या क्या रिकॉर्ड बनाए है और कमला हैरिस का indo US relation में क्या योगदान होने वाला है।

क्या कमला हैरिस सच में भारतीय मूल की हैं??

ये कहना तो बिल्कुल ज़ल्दबाज़ी होगी कि वो सिर्फ भारतीय मूल की हैं। सवाल तो आपके दिमाग में भी आता होगा। क्योंकि कमला हैरिस भारत और जमैका से आए प्रवासी माता पिता की बेटी है।

हां इनकी मां भारत से थी और उन्होंने पूरी कोशिश की अपनी बेटियों को भारत से जोड़ने की, वो बचपन में उन्हे भारत लेकर आती और यहां की संस्कृति से रूबरू करवाती थी।

चूंकि जब हैरिस 7 साल की थी तो उनके माता पिता का तलाक हो गया था और इन्होंने अपनी ज्यादातर जिंदगी अपनी मां के साथ बिताई, जो कि भारत के बहुत क़रीब थी। उनके द्वारा दिए गए मूल्य ओर सभ्याचर की बदौलत आज कमला हैरिस इस मुकाम पे पहुंची है जिनमे कहीं ना कहीं भारतीय मूल्यों का भी काफी योगदान रहा है तो हम कह सकते है कि कमला हैरिस भारतीय मूल की अमेरिकन है।

कमला हैरिस

इनका जन्म 20 अक्तूबर 1964 को कैलिफोर्निया में हुआ। उनको बचपन से है लोकतंत्र में रुचि थी। कमला हैरिस को उनकी बुलंद आवाज़ के लिए जाना जाता है।
जब कमला 7 वर्ष की थी तो उनके माता पिता का तलाक हो गया था। इनकी माता का नाम शामला गोपालन तथा पिता का नाम डोनाल जे हेरिस है।

चुनाव से मात्र 2 दिन पहले की खबर है। कमला हैरिस भारत में जिस गांव (थुलास्पेंधर्म तमिलनाडु में है।)से belong करती थी वहां पर क्यों सारे भारतीय उनके लिए पूजा कर रहे थे उनके जितने कि दुआ कर रहे थे।

कमला हैरिस ने क्या क्या रिकॉर्ड बनाए है??

1. ये अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति बनी हैं।
2.  ये पहली अश्वेत महिला और अफ़्रीकन अमेरिकन महिला है जो उपराष्ट्रपति बनी है अमेरिका में। अफ़्रीकन इसलिए क्योंकि इनके पिता अफ़्रीकन थे, वो जमैका के थे।
3. ये पहली भारतीय कूल की पहली स्खसियत है, जो अमेरिका में किसी राष्ट्रीय कार्यालय को चलाएंगी।
4. इससे पहले भी वो सेंफ्रांसिस्को की जिला अटॉर्नी भी रह चुकी है और ये करनामा करने वाली भी वो पहली अफ़्रीकन अमेरिकन, पहली भारतीयों मूल की और पहली महिला थी।

चुनाव प्रसार के दौरान कई बार कमला हैरिस बताती है कि जब वो छोटी थी तो उनकी मां उनको और उनकी बहन माया को चेन्नई ले कर जाती थी। जिससे इन दोनों को इनके पीछे की पूरी जानकारी हो की ये कहा से आयी हैं और इनके पूर्वजों की संस्कृति कैसी है। उनके इन्हीं विचारों से कई अमेरिकन इंडियन उन से जुड़े और अन्त में वो विजय हुई।

20 जनवरी 2021 को ये शपथ ग्रहण करेंगी और माना जाता है कि इनसे कई अश्वेत लोगों को और महिलाओं को अमेरिकन राजनीति में आने के लिए प्रेरणा मिलेगी।

कमला हैरिस की जीत से भारत को क्या फायदा हो सकता है??

हम जानते है कि कमला हैरिस भारत अमेरिकन community की है। तो जब से इनको इस पद के लिए चुना गया था तब से ही भारतीय अमेरिकन community बहुत ज्यादा खुश थी। लगभग 45 लाख लोग अमेरिका में भारतीय अमेरिकन community से सम्बन्ध रखते है। अब ये सब लोग एक साथ है तो जाहिर सी बात है भारत का पक्ष मजबूत हुआ है अमेरिका में। हैरिस की जीत से भारतीय अमेरिकन जो राजनीति से जुड़े है उनमें भी खासा जोश देखने को मिला है।

आगे के प्लान के बारे में बात करें तो कमला हैरिस कहती है कि

  • हमे COVID जैसी महामारी को जड़ से खत्म करने पर काम करना है।
  • अपनी अर्थवयवस्था को फिर से बापिस पटरी पर लाना है।
  • अमरीका में फैल रहे रंगभेद और नस्लवाद  को खत्म करना है और समाज में आपसी मेलजोल को बढावा देना है।
  • पर्यावरण के मुद्दों पर ध्यान देना है और देश की आत्मा के घाव भरने है।

अगर ये भारतीय नही होता, तो कोई हाई स्पीड इंटरनेट नहीं होता।

यह शर्म की बात है कि आज हम सभी विदेशी भूमि पर विदेशी लोगों की धुन पर नाचते हैं। हम सभी इसे ही सर्वश्रेष्ठ मानते हुए दौड़ रहे है। हम अपनी भूमि के योगदान और महत्व को भूल रहे हैं। हम सभी भूल जाते हैं अपनी ही सभ्यता और संस्कृति को जो हर खोज और आविष्कार की निर्माता है। हमारे वेदों, ऋषियों और मुनियों ने पश्चिमी देशों के सोचने से पहले ही कई खोजें की है।

डॉo नरिंदर सिंह कपानी

ऐसे कई नायक हैं जिनके बारे में हम और आप जानते नही है लेकिन उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का सर ऊँचा किया है, लेकिन दुर्भाग्य से आज उन्हें राष्ट्र द्वारा याद भी नहीं किया जाता है।


डॉo नरिंदर सिंह कपानी के बारे में हम में से कितने लोग जानते हैं। जिन्हें “फाइबर ऑप्टिक्स के जनक” के रूप में माना जाता है।
अगर हमें ‘हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्शन’ की सुविधा मिल रही है, तो यह सब नरेंद्र सिंह कपानी की वजह से है। सिर्फ इंटरनेट ही नहीं लेजर सर्जरी और हाई-स्पीड संचार को भी वो अगले पायदान तक ले कर गए। नरिंदर सिंह कपानी दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘फाइबर ऑप्टिक्स’ शब्द का प्रयोग किया था।

परिचय

31 अक्टूबर 1926 को पंजाब के मोगा में एक सिख परिवार में जन्मे, कपानी ने आगरा विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। आगरा विश्वविद्यालय से सफलतापूर्वक स्नातक किया और फिर इम्पीरियल कॉलेज, लंदन में पीएचडी किया।

उन्होंने न केवल हाई-स्पीड संचार में, बल्कि एंडोस्कोपिक से लेजर सर्जरी तक मेडिकल इमेजिंग का गहन शोध किया। इससे पता चलता है कि अगर नरिंदर सिंह नहीं होते, तो कोई हाई स्पीड इंटरनेट नहीं होता, कोई लेजर सर्जरी नहीं होती और न ही कोई हाई-स्पीड कम्युनिकेशन होता।

शुरुआती सफर

कपानी जी बताते है कि “जब उन्हीने पहली बार तकनीक में काम शुरू किया, तो वो एक आर्डिनेंस फैक्ट्री भारत में काम कर रहे थे और ऑप्टिकल उपकरणों को डिजाइन करना और बनाना सीख रहे थे।

फिर मैं अगले स्तर पर प्रौद्योगिकी के बारे में जानने के लिए लंदन के इंपीरियल कॉलेज (1952) में गये। उसके बाद उन्हें भारत वापस जाकर अपनी कंपनी शुरू करनी थी। लेकिन वहां जाकर उन्होंने जो काम किया वो काविले तारीफ था। वह दुनिया के पहले व्यक्ति बन गये जिन्होंने यह प्रदर्शित किया कि प्रकाश ग्लास फाइबर में यात्रा कर सकता है।

प्रकाशित किये गए शोध पत्र

उनका शोध पत्र “A flexible fiberscope और स्टेटिक स्कैनिंग का उपयोग” शीर्षक से वैज्ञानिक पत्रिका Nature में 2 जनवरी, 1954 को प्रकाशित हुआ। जिसने एंडोस्कोप और लेजर जांच जैसे उपकरणों के लिए रास्ते खोल दिए।

इसके बाद कपानी ने फरवरी 1955 में ऑप्टिका एक्टा में अपना पहला पेपर प्रकाशित किया और ‘ट्रांसपेरेंट फाइबर्स फॉर ट्रांसमिशन ऑफ ऑप्टिकल इमेज’ नाम दिया। एक लेखक के रूप में, उन्होंने ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स पर 100 से अधिक वैज्ञानिक पत्र और चार पुस्तकें प्रकाशित कीं।

उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक societies को व्याख्यान दिया है। 1960 में वैज्ञानिक अमेरिकी में फाइबर ऑप्टिक्स पर उनके प्रसिद्ध लेख ने नया नाम (फाइबर ऑप्टिक्स) दिया।


एक उद्यमी और व्यावसायिक कार्यकारी के रूप में, कपानी को नवाचार की प्रक्रियाओं, प्रौद्योगिकी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रबंधन में विशेषज्ञता हासिल थी।
बहुत कम भारतीयों को पता है कि एक भारतीय, नरेंद्र सिंह कपानी, जो अपने क्षेत्र में अग्रणी हैं और फाइबर ओप्टिक्स के जनक हैं । हम बाद में उनकी कहानी पर आएंगे, लेकिन इससे पहले आइए देखें कि

फाइबर ऑप्टिक्स क्या है? वह महत्वपूर्ण क्यों है?

ठीक है, मान लीजिए कि आप निदान या सर्जिकल उद्देश्यों के लिए मानव शरीर के एक आंतरिक अंग की जांच करना चाहते हैं। आपको प्रकाश ले जाने वाले लचीले पाइप की आवश्यकता होगी।

इसी तरह, यदि आप प्रकाश संकेतों का उपयोग करके संवाद करना चाहते हैं, तो आप लंबी दूरी के लिए हवा के माध्यम से प्रकाश नहीं भेज सकते हैं; आपको ऐसी दूरी पर प्रकाश ले जाने वाली एक लचीली केबल की जरूरत है। ‘

‘जब हम स्कूल में थे तब कार्डिक ट्यूब्स और मिरर के टुकड़ों का उपयोग करते हुए क्लास प्रोजेक्ट के रूप में बनाए गए पेरिस्कोप, वास्तव में प्रकाश को मोड़ने वाले उपकरण हैं। पेरिस्कोप में समकोण पर प्रकाश को झुकाना सरल था। एक चिकनी वक्र के साथ प्रकाश को मोड़ना इतना आसान नहीं है। लेकिन यह किया जा सकता है, और ऑप्टिक फाइबर केबल में यही किया जाता है। ‘

Total internal reflection

कोई भी सतह, चाहे बारीक पॉलिश की गयी हो, कुछ प्रकाश को अवशोषित करती है। इसलिए बार-बार प्रतिबिंब एक किरण को कमजोर करते हैं। ‘
‘लेकिन total internal reflection 100 प्रतिशत होता है। जिसका अर्थ है कि यदि हम कांच का एक टुकड़ा गैर-शोषक बनाते हैं और यदि हम total internal reflection का उपयोग करते हैं। तो हम एक पाइप के अंदर लंबी दूरी पर प्रकाश की किरण ले जा सकते हैं।

‘ये ही है । फाइबर ऑप्टिक्स में इस्तेमाल किया जाने वाला सिद्धांत है।’

करियर

कपानी ने 1960 में ऑप्टिक्स टेक्नोलॉजी Inc की स्थापना की। वह बारह साल तक बोर्ड के अध्यक्ष और अनुसंधान निदेशक रहे और उनकी कंपनी संयुक्त राज्य अमेरिका और विदेशों में कई कॉर्पोरेट अधिग्रहणों और संयुक्त उपक्रमों के साथ सार्वजनिक हुई।

1970 के दशक में, कपानी ने एक और कंपनी, केप्ट्रोन Inc को शुरू किया और 1990 तक CEO के रूप में सक्रिय रहे।

वह सात वर्षों के लिए UCSC में सेंटर फॉर इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरियल डेवलपमेंट के निदेशक भी थे। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में, वह भौतिकी विभाग में एक विजिटिंग स्कॉलर थे और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में परामर्शदाता थे।

बीसवीं शताब्दी में जीवन को पूरी तरह से बदलें वाले लोगों की सूची में नाम

नवंबर 1999 में, फॉर्च्यून पत्रिका ने 7 लोगों के प्रोफाइल प्रकाशित किए थे जिन्होंने बीसवीं शताब्दी में जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था। हमें इस सख्शियत को बढ़ावा देने की जरूरत है जिसने हमें सबसे तेज इंटरनेट कनेक्शन दिया है। जिसकी आज की दुनिया में सबसे ज्यादा मांग है। आज कल हम इंटरनेट के बिना, पृथ्वी पर जीवन की कामना नही कर सकते।

नोबेल पुरस्कार में कपानी जी का बहिष्कार

जब फाइबर ऑप्टिक्स की खोज के लिए फिजिक्स के लिए 2009 का नोबेल चार्ल्स काओ को दिया गया, तो वैज्ञानिक समुदाय कपानी के बहिष्कार पर स्तब्ध था।

हाँ, काओ ने भी इस क्षेत्र में जबरदस्त प्रगति की थी, लेकिन उनका काम केवल कपानी द्वारा किए गए Basic अनुसंधान पर ही निर्भर था। जैसा की बहुत भारतीयों के साथ हुआ (जॉर्ज सुदर्शन, सत्येंद्रनाथ बोस, जगदीश चंद्र बोस आदि के साथ हुआ है) कपानी भी उस सूची में शामिल हो गए। जो की भारतीयों के लिए बहुत उदासीन था।

अन्य पुरस्कार

इसके अलावा उन्हें कई पुरस्कार मिले।
1998 में यूएसए पैन-एशियन अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स की ओर से ‘एक्सीलेंस 2000 अवार्ड’ और प्रतिष्ठित प्रवासी भारतीय सम्मान सहित अनगिनत पुरस्कार और मान्यता प्राप्त है।

इसके अलावा वे ब्रिटिश रॉयल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, ऑप्टिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका सहित कई वैज्ञानिक Socities के साथ जुड़े थे।

वर्तमान में उनके नाम पर 100 से अधिक पेटेंट हैं।

सिख फाउंडेशन नामक एक परोपकारी संगठन से भी जुड़े हैं। जो अमेरिका में सिख समुदाय और अन्य लोगों के बीच बेहतर संबंधों की तलाश करता है।

भविष्य में जब भी आप फाइबर ऑप्टिक्स के बारे में कहीं भी सुने, तो इस हस्ती को याद करना और राष्ट्र को दुनिया में उनके योगदान से अवगत कराना न भूलें।

Source :-

The Better India

Post Card News

Rediff

दीपा मलिक की असाधारण कहानी, व्हीलचेयर से


पैरालम्पियन दीपा मलिक की साहसिक कहानी ।


अगर सभी बाधाओं से जूझने और विजेता बनने की बात की जाए, तो सुश्री दीपा मलिक एक जीवित उदाहरण के रूप में खड़ी हैं। यह उसकी असाधारण प्रतिबद्धता, राष्ट्र की सेवा और उदार दृष्टिकोण की बजह से है। अधिकांश 40-वर्षीय बच्चे अपने रिटायरमेंट की योजना बनाने में व्यस्त होते हैं। क्या आप कभी दो वयस्कों की माँ होकर उस उम्र में खेल में अपना पहला कदम रख सकते हैं? हम शायद ही ऐसा करेंगे। हम पारंपरिक तरीके से सोचने के आदी हैं, क्या हम नहीं हैं?

दीपा मलिक


दीपा मलिक ने अपनी रुकावटों को दूर किया, सामाजिक वर्जनाओं को चकनाचूर किया और अपने आप को सबसे अनोखे तरीके से खड़ा किया। वह वास्तव में खड़ी होने में सक्षम नहीं है, लेकिन आज वह उन सभी के लिए खड़ी है जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं। साथ ही साथ वे जो अपने मन की सीमाओं में फंस गए हैं।


उनका का जन्म 30 सितंबर 1970 को हरियाणा के सोनीपत जिले के भैसवाल में हुआ था। वह एक सामान्य बच्चे की तरह पैदा हुई थी, लेकिन 5 साल की उम्र में उसे स्पाइन ट्यूमर हो गया था। जिसका तीन साल तक इलाज चला। वर्ष 1999 में, उसे फिर से स्पाइनल ट्यूमर हो जाता है। जिससे चलना उसके लिए असंभव हो गया।


परिवार


वह अनुभवी इन्फैंट्री कर्नल बीके नागपाल और मां वीना नागपाल की बेटी हैं। सोनीपत में जन्मी और पली-बढ़ी। उसे अपनी सेना की पृष्ठभूमि पर बहुत गर्व है। उसने एक आर्मी मैन से भी शादी की। उनके पति अनुभवी कर्नल बिक्रम सिंह निश्चित रूप से एक ठोस चट्टान की तरह उनके साथ खड़े हैं। दीपा वर्तमान में गुड़गांव में सहायक एथलेटिक कोच के रूप में काम कर रही हैं। दंपति को दो बेटियों हैं – देविका और अंबिका।


दीपा मलिक – विकलांगता


वर्ष 1999 में दीपा के जीवन में एक अप्रत्याशित मोड़ आया। उसे स्पाइनल ट्यूमर का पता चला। 3 सर्जरी और लगभग 183 टांके लगने के बाद भी तीन सर्जरी के बाद भी उसे कमर से नीचे लकवा मार गया था। तब से दीपा व्हीलचेयर के लिए बाध्य है।
यह चरण मलिक परिवार के लिए अधिक कठिन था क्योंकि दीपा के पति कारगिल में थे। दोनों पति-पत्नी अलग-अलग युद्ध लड़े और बच गए। सर्जरी से पहले, दीपा ने अपने पति से बात की। उसने उससे कहा कि वह फिर कभी नहीं चल पाएगी। उसके पति ने उसे विश्वास दिलाया कि वह उसे जीवन भर अपने साथ रखेगा! पति के साथ-साथ उसके परिवार के प्रति भी इस अटूट प्रेम और समर्थन ने दीपा को जीवन की सभी कठिनाइयों से गुजरने की ताकत दी।


खेलो में नाम


जब वह 36 साल की थीं, तब उन्होंने खेलों में अपना करियर बनाने का फैसला किया। वह पैरालम्पिक खेलों में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और शॉट पुट में 2016 के ग्रीष्मकालीन पैरालिम्पिक्स में रजत पदक जीता। उनकी मनोरम दृष्टि, व्यावसायिकता और उत्कृष्टता ने उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान: पद्म श्री से सम्मानित किया है।

उनके व्यक्तित्व में सबसे खास बात है उनका रवैया और कभी न कहने वाली भावना, जिसने 2014 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मॉडल अवार्ड और 2012 में भारत सरकार द्वारा अर्जुन अवार्ड सहित दुनिया भर में अनेक पुरस्कार और प्रशंसाएं दिलाई हैं।

पैरालंपिक में पदक

स्पोर्ट्सपर्सन और उस रवैये के साथ, उसने रियो पैरालिम्पिक्स में महिलाओं के शॉटपुट एफ 53 इवेंट में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा था। जिसमें 4.61 मीटर की व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो थी! रियो में इस जीत ने उनकी भारत की पहली महिला और पहली एथलीट बन गई जिसने कभी पैरालंपिक में पदक जीता।

बाइक की सवारी

खेल के क्षेत्र में दीपा के सेमिनल प्रयोगों ने अन्य आकांक्षी खिलाड़ियों के लिए रास्ते खोल दिए। एक उम्र में जब ज्यादातर एथलीट रिटायरमेंट पर विचार कर रहे थे, सुश्री मलिक बस शुरू हो रही थीं। वो हिमालयन मोटरस्पोर्ट्स एसोसिएशन में शामिल हुई और शून्य तापमान मे 18,000 फीट पर 8 दिन 1,700 किलोमीटर बाइक चलाई । दीपा ने 4 बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में जगह बनाई। वह फेडरेशन मोटर स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया (FMSCI) से आधिकारिक रैली लाइसेंस प्राप्त करने वाली भारत की पहली शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति बन गईं।

दीपा शारीरिक शिक्षा और खेल पर 12 वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के निर्माण में कार्यरत समूह की सदस्य थीं। बाद में, वह NMDC ’स्वच्छ भारत’ या Ab स्वच्छ भारत अभियान ’की ब्रांड एंबेसडर बनीं। वह एक प्रेरक वक्ता भी हैं, जिन्होंने MNC’s और शैक्षिक सम्मेलनों में व्याख्यान दिए हैं।

पदक जीते

  • IWAS वर्ल्ड गेम्स (2009): शॉट पुट में कांस्य पदक
  • पैरा-एशियाई खेल चीन (दिसंबर 2010): कांस्य पदक
  • आईपीसी विश्व एथलेटिक्स चैम्पियनशिप (जनवरी 2011): रजत पदक
  • IWAS विश्व खेल शारजाह (दिसम्बर 2011): दो कांस्य पदक
  • इंचियोन एशियन पैरा गेम्स (2014): महिलाओं के 53-54 के भाला फेंक में रजत पदक
  • पैरालिंपिक गेम्स, रियो (2016): शॉट पुट में सिल्वर मेडल
  • एशियाई पैरा गेम्स, जकार्ता (2018): 2 कांस्य पदक (जेवलिन थ्रो में 1 कांस्य F53 / F54 श्रेणी, डिस्कस थ्रो में 1 कांस्य F51 / 52/53 श्रेणी)
  • 23 अंतरराष्ट्रीय पदक और 58 राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पदक (51 स्वर्ण, 5 रजत, 2 कांस्य) के अलावा, उनके नाम कई और पुरस्कार हैं।

रिकॉर्ड


• जेवेलिन एफ -53 श्रेणी में आईपीसी एशियाई रिकॉर्ड
• F – 53 श्रेणी में डिस्कस, जेवलिन और शॉट-पुट राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम किए।
• S -1 तैराकी में राष्ट्रीय रिकॉर्ड।
• 2008: 1 किलोमीटर के लिए वर्तमान में यमुना नदी में तैरना। इलाहाबाद
• 2009: राइडिंग स्पेशल बाइक
• 2011: लेह-लद्दाख हाईएस्ट मोटरेबल रोड पर नौ दिनों में नौ उच्च ऊंचाई वाले मार्गों पर ड्राइविंग।
• 2013: सबसे लंबी पैन-इंडिया ड्राइव एक पैराप्लिक महिला (चेन्नई-दिल्ली 3278 किमी) द्वारा की गई


पुरस्कार


2007: रोटरी वीमेन ऑफ़ द इयर अवार्ड
2009: नारी गौरव पुरस्कार
2009: राष्ट्र गौरव पुरस्कार
2012: अर्जुन पुरस्कार
2014: लिम्का लोग ऑफ द ईयर अवार्ड
2017: पद्म श्री पुरस्कार
2019: राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार

लिम्का विश्व रिकॉर्ड

सबसे लंबा ऑल इंडिया ड्राइव चेन्नई – दिल्ली (3278 किलोमीटर), 2013
2011 के लेह-लद्दाख हाईएस्ट मोटरेबल रोड्स पर नौ दिनों में ड्राइविंग नाइन हाई एल्टीट्यूड पास
राइडिंग स्पेशल बाइक, 2009

सूबेदार जोगिंदर सिंह, 1962 का चीन-भारतीय युद्ध की वीर गाथा।

सूबेदार जोगिंदर सिंह


1962 का चीन-भारतीय युद्ध ज्यादातर हार के साथ जुड़ा हुआ है। लेकिन उस भीषण युद्ध ने कई नायकों को भी देखा है। जिनके साहस के अविश्वसनीय कृत्यों ने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। बहादुरी का ऐसा ही एक चमकदार उदाहरण है, सूबेदार जोगिंदर सिंह।

शरुआती जीवन


सूबेदार जोगिंदर सिंह का जन्म 26 सितंबर 1921 को पंजाब के मोगा जिले के महाकलां गाँव में एक किसान सैनी सिख परिवार में हुआ था। श्री शेर सिंह सैनी और बीबी कृष्णन कौर के बेटे, जोगिंदर सिंह ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गांव में की।आर्थिक हालात सही नही होने की बजह से वह अपनी पढ़ाई आगे जारी नहीं रख सके। फिर उनकी शादी हो गई बीबी गुरदयाल कौर बंगा से।

करियर की शुरुआत

28 सितंबर 1936 को ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गए।

द्वितय विश्व युद्ध के समय वो वर्मा के मोर्चे पर तैनात थे। फिर श्रीनगर में 1947-48 के भारत-पाक युद्ध में भी उन्होंने भाग लिया। वे एक मेहनती सैनिक थे । जो बाद मे अपनी unit के instructor भी बने।


1962 का चीन-भारतीय युद्ध


20 अक्टूबर, 1962 को, चीनी सेना की तीन रेजिमेंटों ने मैकमोहन लाइन (भारत और तिब्बत के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा) पर नामका चू पर चतुराई से भारत पर हमला बोल दिया। निचली जमीन पर होने के बावजूद, भारतीय सैनिकों ने चीनियों को कडी चुनोती दी। हालांकि, अप्रचलित हथियारों, गोला-बारूद की कमी और संचार की लगभग न के बराबर मौजूद लाइन, के कारण वे चीनी हमलों और चीनी हमले की बेहतर मारक क्षमता के सामने जीत नही सके।

चीनियों ने अपना ध्यान सामरिक रूप से महत्वपूर्ण शहर तवांग पर नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (अब अरुणाचल प्रदेश) की ओर लगाया। नमका चू से तवांग के लिए सबसे छोटा रास्ता बम-ला अक्ष से होकर गुजरता है।

इस अक्ष की रक्षा को मजबूत करने के लिए, 1 सिख रेजिमेंट (जोगिंदर के नेतृत्व में) की एक पलटन को तुरंत विशाल तिब्बती पठार की ओर देखने वाले टोंगपेन ला क्षेत्र में आईबी रिज पर एक रक्षात्मक स्थिति में तैनात किया गया।

चीन का पहला हमला

23 अक्टूबर 1962 को सुबह सुबह तकरीबन 4 बजे, चीनी सेना ने बुम ला अक्ष पर भारी आक्रमण कर दिया। जिससे तवांग पर कब्जा किया जा सके। आर्टिलरी और मोर्टार से सुसज्जित चीनी सैनिकों ने तीन बार हमला किया। हर बार लगभग 200 से अधिक सैनिक थे। उन्हें उम्मीद थी की वो भारतीय सैनिकों को, जो की संख्या में बहुत कम थे, उनको जल्दी से हराकर तवांग पर कब्जा कर लेंगे।

चीनीओं ने भारतीय सैनिकों के युद्ध कौशल को कम करके आंका था और उस शख्स की हिम्मत को नजरअंदाज कर दिया। जो 23 सिपाहीयों की भारतीय पलटन का नेतृत्व कर रहा था।


उस इलाके का अध्ययन करने के बाद। रणनीतिक रूप से बंकरों और खाइयों के नेटवर्क का निर्माण करने के लिए जोगिंदर और उनके लोगों ने दिन-रात ठंडी परिस्थितियों में (उनके पास कोई शीतकालीन गियर भी नहीं था) काम किया।

इसके बाद हुए पहले हमलें में, इस रणनीति के द्वारा प्रदान किए गए लाभ ने जोगिंदर और उनके लोगों को ली एनफील्ड 303 राइफलों के साथ बेहतर सुसज्जित चीनी की पहली लहर को नीचे गिराने में मदद की। उन्होंने अपने आदमियों को कहा कि तब तक कोई गोली नही चलाएगा जब तक कि दुश्मन पूरी तरह से हथियार-रेंज में नहीं आ जाते।

दूसरा और तीसरा हमला

अपने पहले हमले के त्वरित विनाश से स्तब्ध, चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर दूसरा हमला बोल दिया। लेकिन उन्हें उसी तरह से फिर से निपटा दिया गया। हालाँकि, तब तक पलटन अपने आधे पुरुषों को खो चुकी थी।

जोगिंदर की लात बुरी तरह से जख्मी हो गयी थी। लेकिन वो फिर भी युद्ध में डटे रहे और उसने सभी के साथ लड़ाई जारी रखी। उनके नेता की वीरता से प्रेरित होकर, पलटन अपनी ज़मीन पर खड़ी रही। जैसा कि उग्र चीनियों ने तीसरा हमला शुरू किया, जोगिंदर ने खुद LMG को संभाला और कई चीनी सैनिकों को मौत के गाट उतार दिया। हालांकि, दुश्मन ने अपनी संख्या में भारी नुकसान के बावजूद आगे बढ़ना जारी रखा।

वीरगति

अब प्लाटून का गोला-बारूद भी ख़त्म हो चला था। जोगिंदर और शेष सैनिकों ने अपनी अपनी खाली बंदूके ले कर चीनी सेना पर बन्दुक के भट से हमला शुरू कर दिया। वो, बोले सो निहाल, सत श्री अकाल ” का जय घोष करते हुए कई चीनियों को मौत के घाट उतार गये। जोगिंदर के सैनिकों की वीरता और साहस को देख कर चीनी सैनिक भी स्तब्ध रह गए।


चार घंटे की भीषण लड़ाई के बाद, युद्ध के कैदी के रूप में घायल जोगिंदर को चीनी सेना ने बंधी बना लिया। बाद में उनकी चीनी कैद में मृत्यु हो गई।

जोगिंदर की पलटन के 23 लोगों में से केवल तीन ही बचे थे – वह भी इसलिए क्योंकि उन्हें उनके नेता द्वारा मुख्य सेना शिविर से अधिक गोला-बारूद लाने के लिए भेजा गया था।

जोगिंदर सिंह को सम्मानित किया गया।


दुश्मन के सामने अपनी निस्वार्थता, दृढ़ निश्चय और कच्चे साहस के लिए, सूबेदार जोगिंदर सिंह को मरणोपरांत स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च युद्ध वीरता पुरस्कार, परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया

यह जानने पर कि जोगिंदर को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है। चीनी सेना ने सम्मान के साथ 17 मई, 1963 को रेजिमेंट को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनकी राख को सौंपा और युद्ध में उनकी वीरता को मान्यता दी। बाद में उनकी राख को उनकी विधवा गुरदयाल कौर और छोटे बच्चों को सौंप दिया गया।

Hero of war

मोगा में जिला कलेक्टर के कार्यालय के पास एक स्मारक की प्रतिमा के अलावा, भारतीय सेना ने आईबी रिज में जोगिंदर सिंह के सम्मान में एक स्मारक बनाया है, जबकि शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने उनके नाम पर अपने एक जहाज का नाम रखा है।
अरुणाचल प्रदेश सरकार ने परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता सूबेदार जोगिंदर सिंह के सम्मान में एक युद्ध स्मारक का निर्माण किया है।

उनके एक साथी सैनिक के अनुसार, जब चीनी सेना ने उनके पैर का ऑपरेशन करने को कहा तो उन्होंने इनकार कर दिया।
2018 में, सूबेदार जोगिंदर सिंह के जीवन और 1962 के चीन-भारतीय युद्ध के दौरान उनकी कार्रवाई पर एक बायोपिक बनाई गई थी। पंजाबी अभिनेता-गायक गिप्पी ग्रेवाल ने फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी।

उनके द्बारा किये गए बलिदान और उनके साहस का हर भारतीय कर्जदार है। हमे उनके बलिदान को हमेशा याद रखना है। उन्हें शत शत नमन।


"की जो गाया देश का तुम ने तराना, याद रखेगा।
तुम्हारा मुल्ख पर सब कुछ लुटाना याद रखेगा।
और गये अंदाज जीने और मरने का सिखा कर के।
तुम्हे सदियों तलक सारा जमाना याद रखेगा।।"