हास्यात्मक कहानी

हास्यात्मक कहानी

( एक परिवार जिसमें सिर्फ दो लोग माँ बेटे (वह भी अनपढ़) रहते हैं एक दिन सत्यनारायण की कथा का आयोजन करते हैं। अनपढ़ लोगो द्वारा करायी गयी सत्यनाराण की कथा कुछ इस प्रकार है )

 बेटा : -  अम्मा आज क्या है ? जो सुबह सुबह इतनी जल्दी 
             पूरा घर लीप दिया।                         
 अम्मा : - बेटा आज पूरनमासी/पूर्णिमा है। मैने सोचा है क्यों 
             ना आज सत्यनारायन की कथा करवा ली जाएँ । 
             इसलिए सुबह सुबह मैने .........। 

 बेटा : -  अम्मा सत्यनारायन की कथा कैसे होती है ? 

 अम्मा : - बेटा सत्यनारायन की कथा पंडित जी करते हैं कथा
             सम्पन्न होने के उपरांत पंडित जी को निशराया / 
             दक्षिणा ( आटा,चावल,दाल व धनादि  ) दिया जाता
             है।    
                      
 बेटा : -   अच्छा अम्मा तो पंडित को बुला लाऊँ..? 

 अम्मा : - तू रहने दे,तू सिर्फ नहा धो ले,साफ कपडे पहन ले 
             पंडित जी को तो मैने कथा करने के लिए दो दिन    
             ही बुलावा दे दिया है। वह आते ही होंगे। 

 बेटा : -   अच्छा अम्मा ठीक है। 

( माँ बेटे दोनों तैयार हुए ही थे कि तब तक पंडित जी आ जाते हैं )

 पंडित जी : -   बेटा अनोखे तुम्हारी माँ कहाँ हैं ?

 बेटा(अनोखे) : - अम्मा तो चौका / रसोई में है। 

 पंडित जी : - अच्छा जरा बुलाओ और एक बीच आँगन में 
                    चौक (हवन करने की जगह) पुर्बाओ। तथा 
                    सभी हवन सामग्री ले आओ ताकि अविलम्ब
                    हवन कर सत्यनारायन की कथा प्रारम्भ की         
                    जा सके। 

 अनोखे  : -    ठीक है।
( अनोखे की माँ बीच आँगन में चौक पूर कर समस्त हवन सामग्री पंडित जी को उपलब्ध करा देती है और रसोई में चली जाती है तभी पंडित जी हवन शुरु करने से पहले ही अनोखे को समझाते हुए कहते है)

 पंडित जी : - जैसा जैसा हम कहे, तुम वैसा वैसा कहना ।
                   जैसा जैसा हम करें, तुम वैसा वैसा करना ।।
                   ठीक है समझ गये। कोई गलती नहीं होनी  
                   चाहिए अन्यथा सत्यनाराण की कथा अधूरी    
                   रह जाएगी। 

 अनोखे : -   ठीक है मै ना गलती कोई करुँगा। 
                  जैसा आप कहेंगे वैसा ही करुँगा।। 

 पंडित जी : - चलो पाल्थी आकार में हाथ जोड कर बैठो।

 अनोखे  : -    चलो पाल्थी आकार में हाथ जोड कर बैठो।

 पंडित जी : - यार कथा/हवन शुरु करुँगा ठीक से बैठो।

 अनोखे  : -    यार कथा/हवन शुरु करुँगा ठीक से बैठो।

 पंडित जी : - अरे तू  क्या पागल है ?

 अनोखे  : -    अरे तू  क्या पागल है ?   
                     
 पंडित जी : - देख मान जा मेरी बात, वरना थप्पड़ मार दूँगा। 

 अनोखे  : -    देख मान जा मेरी बात, वरना थप्पड़ मार दूँगा।

 पंडित जी : - अच्छा तो तू मेरे थप्पड़ मारेगा।

 अनोखे   : -   अच्छा तो तू मेरे थप्पड़ मारेगा।

( पंडित जी को गुस्सा आ जाता है और वह अनोखे के थप्पड़  मार देते हैं तभी अनोखे को याद आता है कि जैसा पंडित जी करे वैसा ही करना है नहीं तो सत्यनारायन की कथा अधूरी रह जाएगी। और वह (अनोखे) भी पंडित जी के थप्पड़ मार देता है। पंडित जी को और ज्यादा गुस्सा आ जाता तभी उठकर अनोखे के एक और थप्पड़ मार कर धक्का देते हैं। तभी अनोखे भी एक घूँसा मार कर पंडित जी को नीचे गिरा देता है। पंडित जी नीचे गिरने के बावजूद भी अनोखे को मारने की कोशिश करतें हैं और अनोखे भी पंडित जी को लगातार लाते घूँसे मारता रहता है। चूंकि इससे पहले अनोखे के घर में कभी  सत्यनारायन की कथा का आयोजन हुआ ही नहीं था इसीलिए अनोखे की अम्मा समझ रही थी कि कथा ठीक हो रही है। अतः चौके / रसोई से ही सत्यनारायन की कथा का लुत्फ उठाती रहती है । पंडित जी और अनोखे पटका पटकी में लिपे से बाहर हो जाते हैं। तभी अनोखे की अम्मा कहती है।
                          
 अम्मा : -   बेटा पंडित जी को लिपे में ले आओ।

 अनोखे : - अच्छा अम्मा अभी....। 

(अनोखे पंडित जी को खींचकर लिपे में ले आता है पंडित जी  मारने का प्रयास मात्र करते हैं तब तक तो अनोखे मार मार कर हालात खराब कर देता है। पंडित जी ने सोचा कि अब भागना ही उचित है वरना प्राण बचना मुश्किल है। इसलिए अपनी पोथी पत्रा छोड़ अनोखे के घर से किसी तरह भागने की कोशिश करतें  हैं। तभी अनोखे की अम्मा पंडित जी का हाथ पकड़ कर कहती है। 

 अनोखे की अम्मा  : - पंडित जी अपना निशराओ / दक्षिणा
                                लिए जाओ। 

 पंडित जी : - हाथ झटक कर बोले चल हट बुढिया।

( किसी तरह पंडित जी प्राण बचाकर भागने में सफल हो अपने घर पहुँच जाते हैं )
विचित्र कहानी
 पंडितानी : - तुम तो बहुत रहे हफयाएँ,
                               काहे भागत भागत आएँ,।
                  हमको जल्दी दो बतलाएँ
                              परोसा काहे नही लाएँ ।।

 पंडित जी : - तुमको पडी परोसे की,
                                 हमरे प्राण बहुत घबराएँ।
                    निर्दोष दूध में हल्दी दे दो,
                                 सारी देह रही  कल्लाएँ।।



_                
    ..✍️कवि/लेखक - निर्दोषकुमार "विन" 
                     
                         (बरेली)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Post

man people woman village

शिक्षक दिवस पर एक प्रेरक प्रसंगशिक्षक दिवस पर एक प्रेरक प्रसंग

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति, महान दार्शनिक और शिक्षक डॉ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिन पर बहुत बहुत शुभकामनायें एवं नमन।

%d bloggers like this: