पर्यावरण की गुहार | आभा सिंह की खूबसूरत रचना

हिन्दी कविता प्रतियोगिता के प्रतिभागी

कविता

पर्यावरण दिवस पर “आभा सिंह” की रचना “पर्यावरण की गुहार” में बहुत ही खूबसूरत तरीके से व्याख्यान किया है, कि प्रकृति मानव से क्या कहना चाहती है? हमे इसे आने वाली पीढ़ी के लिए बचाकर कर रखना है नहीं तो हमारी आने वाली नसलें इस प्रकृतिक सौन्दर्य को नहीं देख पायेंगी।

शीर्षक- पर्यावरण की गुहार

सुरभित -  मुखरित  पर्यावरण की  यही गुहार, 
सुन  लो  मानव  मेरी  पुकार... 
करो  ना  मुझपे  घातक   प्रहार, 
हरे - भरे  पेड़ पौधों  को  नष्ट  करके, 
मत  उजाड़ो मेरा  संसार... 
मैं  पृथ्वी का  जीवन दाता, 
मैं  ही  उसका  भाग्य- विधाता.. 
करने  हैं  मुझे  सब  जीवों  पर  उपकार, 
मत  करो  मेरे  पहाड़ो  पर  विस्फोटक  वार.. 
सुन्दर  सुरभित बाग और  बगीचे मेरे, 
हे  मानव! य़े  सब  काम  आयेंगे  तेरे.. 
मेरी  धरा  पर  पला  बढ़ा  तू, 
फिर  से  कर  ले  तू  विचार... 
कुछ  ना  बचेगा  अगर धरा  का आवरण छूटा,
और  मेरे  सब्र  का  बाँध  टूटा... 
मेरे  साथ  अगर  अन्याय  करोगे,
तो  न्याय  कहाँ  से  पाओगे.. 
सुरभित उपवन व  मुखरित  झरने, 
कहाँ  से  लाओगे.... 
आज़  लेकर  एक  नया  संकल्प,
करेंगे  वसुंधरा का  श्रृंगार..
देकर  नवजीवन  इस  पर्यावरण को,
कर  सकेंगे  सबका  उद्धार...
सुरभित - मुखरित पर्यावरण की  यही  गुहार.. 
सुन  लो  मानव  मेरी  पुकार..!!

स्वरचित-

आभा  सिंह

लखनऊ,उत्तर  प्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published.