नेताजी, Mystery और History

सुभाष चंद्र बॉस

आज हम आपको एक ऐसे इंसान की कहानी बताने जा रहे है। जिस इंसान ने देश के लिए बहुत कुछ किया है। अपनी पूरी की पूरी जिंदगी जिसने देश के नाम कर दी। जिसने जब से होश संभाला सिर्फ देश के बारे मे सोचा। उस इंसान ने इतना कुछ किया है देश के लिए लेकिन आपको उसके बारें मे ज्यादा कुछ पता नहीं है। आपको गांधी जी के बारे मे सब पता होगा नेहरू ने क्या किया आपको पता होगा, लेकिन सुभाष चंद्र बॉस की कोई बात नहीं करता है। हाँ अब पिछले कुछ सालों से उनके बारे मे बातें होनी शुरू हुई है कुछ web series भी बनने लगी है। तो आज हम उसी महान हस्ती की बात करने जा रहे।

शुरुआती जीवन।

इनका जन्म हुआ था 23 जनवरी 1897 को कटक मे। ये बचपन से ही बहुत मैदावी थे। अच्छे परिवार से भी थे। बॉस जी विवेकानंद को बहुत मानते थे। उनसे ही प्रभावित हो कर हो कर उन्होंने ये सोच लिया था, कि मुझे देश के लिए कुछ अच्छा, कुछ बड़ा करना है। वो बुराई के आगे हमेशा खड़े रहते थे।

एक बार बॉस जी कक्षा मे बैठे थे तभी एक अंग्रेज अध्यापक ने हिंदोस्तान के विरुद्ध कुछ उपशब्द बोल दिए। जिसके कारण बोस जी की उस अध्यापक से लड़ाई हो जाती है और इन्हे कॉलेज से निकाल दिया जाता है।

सिवल सर्विसेज़ से इस्तीफा।

इनके पिता जी चाहते थे कि सुभाष नौकरी करे। जिसके लिए इन्हे लंदन भेज दिया जाता है civil service के पेपर की तैयारी करने के लिए। बोस जी ने पेपर दिया और पूरे भारत मे चौथे स्थान पर रहे। लेकिन फिर भी उन्होंने civil services को छोड़ दिया क्योंकि उनको लगा कि मै सिवल सर्वेन्ट बन कर भी अंग्रेजों का गुलाम हूँ। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और आ गए देश की सेवा मे।

आजादी की लड़ाई मे सुभाष चंद्र बॉस का योगदान।

स्वराज अखबार ।

1921 मे बॉस जी ने “स्वराज” नामक अखबार लिखना शुरू किया। अपने अखबार के माध्यम से लोगों को आजादी के लिए जागृत करना शुरू किया। लोग इनसे बहुत प्रभावित होने लगे। इनको नेता जी के नाम से जाना जाने लगा।

कांग्रेस मे शामिल।

वो लोगों मे इतने प्रचलित हो गए कि, 1923 मे इन्हे भारतीय youth congress का president घोषित कर दिया सिर्फ दो ही साल मै। इनकी सोच ने, लोगों मे भी आजादी का जोश और जज़्वा भर दिया। अब अंग्रेजों को भी इनसे डर लगने लगा था। बोस जी को जेल मे डाल दिया। फिर कुछ समय बाद बॉस जी बाहर आ गए तथा 1927 मे इनको कॉंग्रेस का general secretary बना दिया गया।   

नेता जी और नेहरू मे दोस्ती

धीरे धीरे नेहरू और सुभाष मे दोस्ती हो गई क्योंकि दोनों को पूर्ण स्वराज चाहिए था। जब इनके सुर कांग्रेस से नहीं मिले तो दोनों ने अपनी अलग पार्टी बना ली Indian independent league, फिर गांधी जी ने समझा बुजा के इनको कांग्रेस मे ही रखा।

The Indian Struggle किताब।

1930 मे सुभाष जी यूरोप जाते है और वहाँ कई लोगों से मिले और फिर एक किताब लिखी the Indian struggle, उसमे उन्होंने अंग्रेजों के बारे मे लिखा था। कैसे वो इंसानियत पे अत्याचार करते थे। इस किताब पर लंदन मे रोक लगा दी गई थी। लेकिन सुभाष जी लोगों मे और प्रचलित होते गए, लोग इनको बहुत मानते थे।

नेताजी और गांधी जी की अलग अलग विचारधारा।

एक बात ध्यान रखना, जब कोई बड़ी जल्दी आगे बड़ता है तो साथ वालों को रास नहीं आता है। 1938 तक सुभास चंद्र बॉस इतने प्रचलित हो गए थे कि हरीपुरा अधिवेशन मे सुभाष जी को कॉंग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेस का एक खेमा तो इनके पक्ष मे था, लेकिन इनके विरुद्ध मे थे । महात्मा गांधी और कांग्रेस के कुछ लोग जिन्हे बॉस जी की ideology समझ मे नहीं आती थी। हाँ ये बात भी है कि सुभाष चंद्र बॉस गांधी जी कि बहुत इज्जत करते थे।

नेताजी का कांग्रेस से इस्तीफा।  

1939 मे बॉस जी फिर से चुनाव मे खड़े हो जाते है। लेकिन गांधी जी उनके विरुद्ध अपना एक आदमी खड़ा कर देते है, और उसे पूरा सहयोग भी देते है लेकिन बॉस जी चुनाव जीत जाते है और दोबारा अध्यक्ष चुन लिए जाते है। इससे गांधी जी नाराज हो जाते है। कांग्रेस दो खेमे मे बँट जाती है क्योंकि गांधी जी को नेताजी की विचारधारा विलकुल भी पसंद नहीं थी। ये बात जब सुभाष जी को पता चली तो उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। वो नहीं चाहते थे की भारतीय आपस मे लड़ाई करें। इसके बाद 1940 मे उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी बनाई forward bloc,  

हिटलर से मुलाकात

1941 मे ये जर्मनी चले जाते है और हिटलर से जा कर मिलते है। वो चीजों को देखते है उन्हे समझते है। उनके व्यक्तित्व मे जादू था जिससे हिटलर भी प्रभावित था। नेताजी ने वहीं से ये आजादी की लड़ाई को नये सिरे से लड़ते है।

आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व।

रास बिहारी बॉस की सहायता से 1943 मे ये सिंगापूर पहुँच जाते है। वहाँ जाकर निरक्षण करते है आजाद हिन्द फौज का। फिर बॉस जी ही आजाद हिन्द फौज की कमान संभालते है और अंग्रेजों के  दांतों तले चने चवा देते है। उन्होंने नारा दे दिया “तुम मुझे खून दो मे तुम्हें आजादी दूंगा”।

सेना की टुकड़ियों को नाम दिए रानी झांसी रेजीमेंट, गांधी रेजीमेंट, नेहरू रेजीमेंट इससे ही पता चलता है कि वो भारत से कितना प्यार करते थे। उनका निजी कुछ नहीं था। वो जो भी कर रहे थे सब देश के लिए कर रहे थे। उनका आजादी पाने का रास्ता गांधी जी से अलग था लेकिन उनके प्रति बॉस जी के मन मे कोई द्वेष नहीं था।

1943 मे ही बॉस जी स्थापना करते है आजाद हिन्द सरकार की जिसके मुख्य कार्यालय थे सिंगापूर और रंगून मै।

दूसरा विश्वयुद्ध और जापान की हार।

इस समय ही पूरे विश्व मे दूसरा विश्व युद्ध चल रहा होता है। इंग्लैंड को उसके सहयोगी देशों का साथ मिल जाता है। जिससे जापान कमजोर पड़ जाता है।  परिणाम स्वरूप आजाद हिन्द फौज भी अंग्रेजों से हार जाती है।

इसी बीच मे सुभाष चंद्र बॉस जी घूम हो जाते है। इसके पीछे कई कहानियाँ है। अलग अलग लोगों की अलग राय है। लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है की सुभाष जी कहाँ गए उनके साथ क्या हुआ।

हम इतना आवश्य जानते है कि वो भारत माँ का एक ऐसा शेर था। जिसने अकेले ही अंग्रेजों की नाक मे धम कर रखा था। वो निस्वार्थ देश सेवा मे लगे रहे। ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि, भारत माँ के इस वीर को जो सम्मान मिलना चाहिए था। वो मिला नहीं। नोट पर फोटो के और भारत रत्न के ये सबसे बड़े अधिकारी थे। लेकिन वो हमारे दिलों मे जिंदा है और हमेशा रहेंगे।

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